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पश्‍चिम बंगाल में आरक्षण

समय दर्पण प्रतिनिधि
पश्‍चिम बंगाल में मुस्लिमों को आरक्षण देने संबंधी कानून पास हो गया है । अब पश्‍चिम बंगाल में भी मुस्लिमों को आरक्षण मिलेगा । आरक्षण प्राप्त हो जाने से अब मुस्लिमों को प्रत्येक सरकारी नियोजन में आरक्षित सीटें प्राप्त हो जाएंगी । सवाल अब यह नहीं है कि मुश्किलों या पिछड़ों को आरक्षण क्यों मिले, सवाल यह है कि क्या आरक्षण के लिए एक विशेष मापदण्ड बनाने की आवश्यकता नहीं है? हमारे देश में बेरोजगारी अपने चरम पर है, गरीबी, बेकारी की समस्या अब नासूर बनती जा रही है । ऐसे में क्या ऐसा महसूस नहीं होता कि आरक्षण के जो पैमाने हैं उनमें कुछ बदलाव होने चाहिए ।

आरक्षण के पैमाने तय करने वाले स्यंभूओं ने इतना तो तय कर लिया कि किसे आरक्षण मिले और किसे ना मिले लेकिन अगड़े-पिछड़े जाति पर आरक्षण का पैमाना तय करना क्या उचित है?

गरीब और गरीबी की जाति नहीं होती उनका कोई धर्म नहीं होता, गरीब मतलब तो हर वो इंसान होता है, जिसके पास दो जून की रोटी के लिए कोई विकल्प नहीं होता है, तो क्या ऐसे में गरीबी के ऊपर आरक्षण के पैमाने आधारित नहीं करने चाहिए । गरीब तो क्या अगड़ी जाति और क्या पिछड़ी जाति, सभी में गरीब लोग होते हैं तो क्या तात्कालिक आरक्षण प्रणाली से उन गरीबों को न्याय मिल पा रहा है जो गरीब होते हुए भी आरक्षण का कोई लाभ नहीं उठा पा रहे हैं ।

आरक्षण का तो निर्माण ही इसलिए हुआ ताकि जो सामाजिक मुख्य धारा से विमुख लोग हैं उनको इसमें शामिल किया जाए तो क्या गरीब लोग इस पैमाने के अंदर नहीं आते हैं?