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अर्श (बवासीर, PILES)

डा० कमल किशोर प्रसाद वर्मा
विषय प्रवेश :-

अर्श एक दीर्घकालीन प्राणघातक बीमारी है । इसका शाब्दिक अर्थ होता है- अरि+श= अर्थात्‌ दुश्मन, रिपु, शत्रु आदि तथा ‘श’- अर्थात्‌ वह वैरी रोग । अतः शास्त्रकारों ने “अरिवत्‌ प्राणात्‌ श्रृणाति, हिनस्ती अर्श अति:” अर्थात्‌ जो रोग शत्रु की तरह मानव के प्राणों को नष्ट कर देता हो उसे ही अर्श, बवासीर कहते हैं ।

अर्श की परिभाषाएं

अर्श की परिभाषाएं एवं लाक्षणिक विश्लेषण आयुर्वेद-शास्त्र के “माधव निदान” के अन्तर्गत विस्तृत रूप से किया गया है । समासतः उसे आंत के अन्तिम भाग का वह मलाशय रोग कहा जा सकता है जिसके अन्तर्गत गुदाद्वार के निम्न भाग की शिराओं में दूषित रक्‍त भर जाता है । परिणामतः गुदाद्वार की त्रिवली की नसें फूलकर बड़ी और मोटी हो जाती हैं जो ठीक मुनक्‍का, ‘मटर’ या इससे भी बड़े आकार की दिखाई पड़ सकती है जिसे मांसांकुर या मस्सों के रूप में जानते हैं । इसे बवासीर (अर्श) कहा गया है । वाराणसी के होम्योपैथिक चिकित्सक डा० सुरेश प्रसाद शर्मा ने लिखा है कि `` Piles are small tumours consisted of swollen Veins in the Anul region'' मल द्वार से सम्बन्धित खून के भार से आक्रान्त शिराओं की स्फीति पैदा होकर उपमांस के आकार में एक अंकुर की तरह निकल आती है । इसे बवासीर (अर्श) कहते हैं ।

कलकत्ता के ख्याति प्राप्त होम्योपैथ श्रद्धेय डा० एन० सी० घोष ने “मलद्वार के भीतर या बाहर छोटे-छोटे अर्बुद (Tumours) जैसे दाने पैदा हो जाने वाले रोग को पाइल्स (Piles) कहा है । ” डा० इन्द्र मोहन झा की दृष्टि में मलाशय के चारों ओर ... अशुद्ध रक्‍त वाहनियों (Haemorrhoidal Veins) पर जब मल या इन्द्रिय आदि का दबाव पड़ता है तब शिराओं का विस्फोट होकर अंकुर के समान लटक जाने वाला रोग बवासीर कहलाता है ।

अर्श (बवासीर) के प्रकार (kind of piles) - बवासीर मुख्यतः निम्न प्रकार के होते हैं-

1. अरक्‍त स्रावी या ब्राह्य अर्श ( External or Blind or Non-bleeding piles) : - जब मलाशय की आकुंचक पेशी (Sphineter) बाहर बवासीर होता है तो वह चमड़े से ढका रहता है, इसमें मस्से बाहर निकल कर फूल जाते हैं । जब तक मांसांकुर छोटे रहते हैं तब तक पीड़ा नहीं होती- किन्तु जलन, गर्मी, कब्जियत आदि बने रहते हैं । बड़े होने पर सम्पूर्ण मलद्वार में कष्ट होता है । इसमें बवासीर से रक्‍त नहीं गिरता जिससे इसे बादी बवासीर (Blind piles) कहते हैं । हकीम गण इसे ही बवासीर ‘सफराबी’ कहते हैं ।

2. आन्तरिक या रक्‍त स्रावी अर्श (Internal or Bleeding Piles) :- जब मलाशय की आकुंचक पेशी के अन्दर अर्श होता है तो वह म्युकस मेम्ब्रेन Mucous Membrane) ढका रहता है । इसमें मस्से गुदा के भीतर टपक के दर्द, घाव, खुजली, जलन, सूजन, आदि पैदा करते हैं तथा रक्‍त आता है जिसे हम रक्‍तार्श या खूनी बवासीर कहते हैं । इसमें भी मलावरोध रहता है ।

3. संयुक्तार्श या मिश्रित अर्श (Mixed Piles) :- इसमें आंव का स्राव अधिक मात्रा में होता है । इसका (White Piles) के रूप में भी कहीं-कहीं प्रयोग हुआ है किन्तु ऐसे अर्श की गिनती नगण्य है ।

4. ऑवस्रावी अर्श (Mucous Piles) :- इसमें आंव का स्राव अधिक मात्रा में होता है । इसका White Piles के रूप में भी कहीं कहीं प्रयोग हुआ है किन्तु ऐसे अर्श की गिनती नगण्य है ।


अर्श रोगोत्पत्ति के प्रमुख कारण (Important Aetiology of Piles) :- बवासीर कब्ज का ही दुष्परिणाम है । इसके अतिरिक्‍त अन्य प्रमुख कारण निम्नांकित हैं:-

1. यकृत (Liver) :- पाचन संस्थान का यकृत सर्वप्रधान अंग है । इसके भीतर तथा यकृत धमनी आदि में पोर्टल सिस्टम रक्‍त की अधिकता (Congestion) होकर यह रोगित्पन्‍न होता है । श्रद्धेय डा० एन० सी० घोष प्रभृति विद्वानों ने भी यकृत-दोष को ही आर्शोत्पत्ति का प्रमुख कारण माना है ।

2. कब्ज (Constipation) :- दीर्घकालीन कब्ज बवासीर की जड़ है । निरन्तर मलावरोध के कारण मलान्त्र निष्क्रिय एवं प्रदाहित हो जाता है तथा मूलाधार में मांसांकुर उत्पन्‍न हो यह रोग होता है ।

3. उदरामयः- निरन्तर तथा तेज उदरामय निश्‍चित रूप से बवासीर उत्पन्‍न करता है ।

4. अधिक भोजन :- “अतिभोजन अर्श रोग मूल कारणम्‌” अर्थात्‌ आवश्यकता से अधिक भोजन करना बवासीर का प्रमुख कारण है ।

5. मद्यपान एवं अन्य नशीले पदार्थों का सेवन :- अत्यधिक शराब, ताड़ी, भांग, गांजा, अफीम आदि के सेवन से बवासीर होता है ।

6. चाय एवं धूम्रपान :- अधिकाधिक चाय, कॉफी आदि पीने तथा दिन रात धूम्रपान करने से अर्शोत्पत्ति होती है ।

7. गरिष्ठ भोजन :- अत्यधिक मिर्च, मसाला, तली हुई चटपटी चीजें, मांस, अंडा, रबड़ी, मिठाई, मलाई आदि के अंधाधुंध सेवन करने से यह रोग होता है ।

8. पेशाब संस्थान :- मूत्राशय की गड़बड़ी, पौरूष ग्रन्थि की वृद्धि, मूत्र पथरी आदि रोग में पेशाब करते समय ज्यादा जोर लगाने के कारण" भी यह रोग होता है ।

9. शारीरिक परिश्रम का अभाव :- जो लोग दिन भर आराम से बैठे रहते हैं और शारीरिक श्रम नहीं करते उन्हें यह रोग हो जाता है ।


अर्श के लक्षण -
जब कोई व्यक्‍ति बवासीर से ग्रसित हो जाता है तो कब्ज की उसे शिकायत सदा बनी रहती है तथा अन्य लक्षण संक्षेप में निम्नांकित हैं :-


1. मांसांकुर :- इसमें गुदाद्वार की त्रिवलि की नसें फूलकर बड़ी हो जाती हैं जो मटर ‘चना या मुनक्‍का’ की तरह देखने में लगती हैं । यह एक-दो से लेकर दस-बारह तक अंगूरों के गुच्छे की तरह हो सकते हैं ।

2. खुजली :- अर्श रोग की प्रारम्भिक अवस्था में जब अर्बुद ढीले रहते हैं तब उसमें कोई कष्ट नहीं होता । ऐसी हालात में शौच के पूर्व पश्‍चात्‌ मलाशय में खुजली होती है । ‘मल द्वार खुजलाता है, सुरसुरी होती है, कभी-कभी प्रदाह और दर्द होता है, सूजन आ जाती है और जलन होती है । इस समय चलने-फिरने में रोगी को बड़ी भारी तकलीफ होती है । पाखाने के समय बड़ी तकलीफ होती है ।”

3. मलाशय में अटकने की अनुभूति :- शौच के समय जोर लगाने पर मस्से बाहर निकलते हैं जिसे पुनः अन्दर करने में रोगी को कष्ट होता है, कभी-कभी मस्सों को उंगली से भीतर करना पड़ता है । ऐसी स्थिति में पूर्णरूप से मल विसर्जन भी नहीं होता ।

4. मलावरोध :- बवासीर की जड़ एक मात्र कब्ज ही है । रोगी को कब्ज हमेशा बना रहता है, कठिन मल खूब जोर लगाने पर गांठ-गांठ निकलता है । दस्तकारक दवाएं खाने से भी कब्ज दूर नहीं होती । कई दिनों तक पाखाना नहीं होता ।

5. दर्द एवं रक्‍तस्राव :- खूनी बवासीर में शौच के पूर्व एवं पश्‍चात बवासीर से रक्‍त मिलता है । डा० एन० सी० घोष ने लिखा है कि “खून गिरता है, खून की पिचकारी-सी चलती है, नवीन (Acute) अवस्था में बहुत ज्यादा दर्द रहता है, शौच करते वक्‍त जब मस्से बाहर निकलते हैं तब भारी तकलीफ होती है । मस्से बाहर निकल आने से मलद्वार की आकुंचन पेशी (र्स्फीटर) उन्हें दबा लेती है जिससे प्रदाह हो जाता है ।”

6. मनोविकार :- अधिक दिनों तक रोग भोगने से ‘मनोस्नायु दौर्बल्य’ चिन्ता, उन्माद आदि मनोविकारों के लक्षण दिखाई देने लगते हैं ।

7. मल :- बवासीर के रोगी का मल ढीला, कड़ा, गांठदार, रक्‍त-मिश्रित, आंवयुक्‍त आदि हो सकते हैं किन्तु अर्श के मल को पहचानने के कुछ विशेष लक्षण भी स्मरणीय हैं- रक्‍त कभी बूंद-बूंद गिरता है, कभी लाल, कभी चमकीला, कभी काले-काले, कई रंगों की तरह गिरते हैं, कभी पिचकारी की तरह तो कभी झरने की तरह निःसृत होता है- बवासीर से; किन्तु कड़े मल के एक ओर खून की एक पृथक रेखा-सी बनकर स्पष्ट दिखायी देती है ।


अर्श के असाध्य रोग की पहचान :-

अर्श (बवासीर) रोग जब भयंकर रूप से ग्रसित कर लेता है तब गुदा द्वार, नाभि, लिंग, अण्ड-कोष, मुख-मण्डल एवं हाथ-पैर आदि अंग-प्रत्यंगों में सूजन आ जाती है । रोग श्वांस-काश, ज्वर बेहोशी, वमन, अरूचि, हृदय में वेदना, अधिक रक्‍तस्राव, कब्जियत, गुदास्थान पक कर उसमें पीले रंग का फोड़ा होना, अत्यधिक प्यास तथा सर्वांग शिथिल होने से अत्यन्‍त कष्टमय एवं दुखित जीवन व्यतीत करना पड़ता है । बवासीर के रोगी के लिए उक्‍त लक्षण अत्यन्‍त खतरनाक एवं जीवन हीनता के अशुभ लक्षण हैं ।

अर्श निरोधिनी चिकित्सा (Prophylactic Treatment of Haemorrhoids) ः- बवासीर जैसे संघातिक एवं दीर्घकालीन कष्टदायक रोग से मुक्‍ति पाने के लिए सौ दवा की तुलना में एक संयम ही अधिक श्रेयष्कर है । सच तो यह है कि यदि कुपथ्य न किया जाए तो दवाओं की आवश्यकता नहीं पड़ती तथा रोगी मात्र खान-पान एवं आहार-व्यवहार से स्वस्थ हो जाएगा । अतः अर्श रोग की चिकित्सा का पहला कदम है- ‘कब्ज न रहने देना ।’ इस हेतु हमें ऐसा भोजन करना चाहिए जिससे मलावरोध न हो सके । बवासीर-रोगी को निम्नांकित खाद्य-पदार्थ प्रयोगनीय हैं ः-

1. खाद्यान्‍न :- चोकर समेत आटे की रोटी, गेहूं का दलिया, हाथ कुटा- पुराना चावल, सोठी चावल का भात, चना और उसका सत्तू, मूंग, कुलथी, मोठ की दाल, सही, तक्र (छाछ-अर्श रोग के लिए सर्वोत्तम है) आदि ।

2. हरी सब्जियां :- परवल, पपीता, भिण्डी, अंद्रिअम, केला का फूल, मूली, गूलर, ओल, गाजर, शलजम,, करेला, तुरई ।

3. शाक :- पालक, बथुआ, पत्ता गोभी, चौलाई, सोया, जिवन्ती, काली जीरी के पत्ते का शाक ।

4. फल : पका पपीता, पका बेल, सेव, नाशपाती, अंगूर, तरबूज, मौसमी फल, किशमिश, छुआरा, मुनक्‍का, अंजीर, नारियल, सन्तरा, आम, अनार, ओल, आंवले का मुरब्बा, गूलर, जामुन ।

5. रस :- नीम्बू, गाजर, आंवला, मधु ।

6. दूध :- गाय, बकरी, ऊंटनी ।


प्राकृतिक चिकित्सा मन्दिर, गोरखपुर के डा० विट्‌ठलदास मोदी ने बवासीर के रोगी का भोजन इस प्रकार बताया हैः- सवेरे-पपीता या खरबूजा या नाशपाती और दूध; दोपहर-दलिया और कोई पत्तीदार भाजी; शाम- (1) कोई तरकारी और किशमिश या (2) रोटी-तरकारी और थोड़ा मुनक्‍का या अंजीर अथवा (3) कोई फल और नारियल या (4) तरकारी और नारियल । (अंजीर, किशमिश, मुनक्‍का एक बार में पचास ग्राम से सौ ग्राम तक लिए जा सकते हैं) नारियल की गिरी कच्ची हो तो सौ ग्राम तक और सूखी हो तो एक बार में पचास ग्राम तक ली जा सकती है । केवल भोजन के इस परिवर्तन से कितने ही बवासीर के रोगियों का कब्ज जा सकता है और उन्हें अपने रोग में बहुत राहत मिल सकती है, पर जितना पुराना रोग हो गया है अथवा जिसकी आंतों की गर्मी के कारण मल सूख जाया करता है, उन्हें आंतों की मदद के लिए कुछ दिनों तक ईसबगोल का प्रयोग करना पड़ सकता है । इसके लिए या तो प्रत्येक भोजन के साथ ईसबगोल की भूसी तीन ग्राम भर की मात्रा में प्रयोग करना चाहिए (यदि ईसबगोल का इस्तेमाल करना हो तो ईसबगोल को बीस गुणे वजन पानी में बारह से चौबीस घंटे पहले भिगो देना चाहिए) । जब पेट साफ होने लगे, ईसबगोल की मात्रा कम करते हुए इसका उपयोग बंद कर देना चाहिए ।



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