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Today : 18-05-2012 
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ग्रामीण जीवन में दीनता


(ग्रामीण परिवेश । नीलकंठ के परिवार का साधारण मकान । नीलकंठ की माँ चिन्तित मुद्रा में चटाई पर बैठकर मुन्ना की फटी-पुरानी कमीज टाँक रही है । गीली आँखों से आँसू अनायास टपक रहे हैं । दुबला-पतला छोटा-सा बालक मुन्‍ना बगल में लेटा हुआ है । एक पुरानी चारपाई पर नीलकंठ के रूग्ण-वृद्ध पिता भोला हुक्‍का पी रहे हैं । बीच-बीच में थोड़ा खाँसते भी हैं । )


मुन्‍ना - माँ, बहुत जोर से भूख लगी है । कुछ खाना दो माँ । नहीं तो मर जाऊँगा ।
माँ - (आतुर होकर विवशता और दुलार के मिश्रित भाव से मुन्‍ना की पीठ सहलाती हुई) - सो जा बेटा । रात में भर पेट खाना दूँगी । अभी कुछ नहीं है । (उदासीन मुख पर आँसू का वेग प्रबल हो जाता है ।)
मुन्‍ना - नहीं माँ, प्राण सूख रहे हैं, थोड़ा-सा भी दे दो ।
माँ - (कटोरा में थोड़ा पानी लेकर) ले, थोड़ा पानी पी ले । (मुन्‍ना उठकर पानी पीता है और पुनः चटाई पर हताश भाव से लेट जाता है ।)
भोला - (दुःखातुर भोला जल्दी- जल्दी हुक्‍का से दम खींच कर धुँआ बाहर फेंकता है । कुछ सोचकर हुक्‍का को बगल में रखता है । फिर, निस्सीम आकाश की ओर देखकर)- भगवान! यह नन्हा बच्चा किस तरह दिन-दिन भूखा रह सकेगा? (अतिशय व्याकुल होकर पत्‍नी से)- देवी, भूख के कारण आज मुन्‍ना कमजोर हो गया है! इसकी हालत देखी नहीं जाती है.. लाओ, कोई बर्तन! मैं भिक्षा के लिये जाऊँ ।
मुन्‍ना की माँ - (व्यग्र होकर) इस चौथेपन में आप भिक्षाटन करेंगे? हाय रे दैव! आज क्या सुन रही हूँ!! स्वामी, दुनिया क्या कहेगी? इससे बढ़कर पुरूषार्थहीन और भी कोई काम है क्या? यह कुकर्म आप कर सकेंगे?
भोला - (मुन्‍ना के समीप बैठकर उसके दुर्बल नंगे बदन पर हाथ फेरते हुए)- देवी, सन्तान की ममता प्रबल है! भीख के अतिरिक्‍त दूसरा उपाय ही क्या है? यह फूल-सा कोमल बच्चा, भूख के मारे मुरझा गया है । देर करने पर कुछ भी हो सकता है! कहीं से कुछ माँगकर लाने दो ।
मुन्‍ना की माँ - किन्तु स्वामी.....
भोला - किन्तु क्या प्रिये?
मुन्‍ना की माँ - इस निम्न कार्य को करने के लिए मेरी आत्मा स्वीकार नहीं करती ।


भोला - देवी! तुम नहीं जानती । भीख माँगना अनुचित है, अशोभनीय है । कुकर्म नहीं है! परन्तु, जब जीना भी मुश्किल हो, तब भिक्षाटन ही क्या, नीचतम कुकर्म करने के लिये आदमी बाध्य हो जाता है । ऐसी ही विवशता में चोरी, डकैती, राहजनी और हत्या की शुरूआत होती है ।
मुन्‍ना की माँ - इस कटु सत्य को देखने की शक्‍ति समाज में कहाँ है? भीख माँगना घृणा और अपराध की कोटि में गिना जाता है ।
भोला - तुम ठीक कहती हो, देवी! पेशेवर भिखारियों ने इसे ऐसा ही कुकर्म बना दिया है । लेकिन, आज मेरा भीख माँगना प्राणरक्षक आपद्‌धर्म है ।
मुन्‍ना की माँ - आपद्‌धर्म की विवशता एक दिन आपकी पेशागत प्रवृत्ति बन जायेगी ।
भोला - (द्रवित होकर) देवि! तुम मुझे भयभीत मत करो । आज भिखारी भी बनने दो मुन्ना के लिये.... तुम तो मुन्‍ना की माँ हो न? अब उसकी दशा देखी नहीं जाती मुझसे......! (माँ व्याकुल होकर मुन्‍ना को हृदय से लगा लेती है । नेपथ्य से आवाज आती है)
नेपथ्य से - माँ...! माँ....!!
(माँ और भोला जिज्ञासा की दृष्टि से नेपथ्य की ओर देखते हैं।)
मुन्‍ना की माँ - कौन?... कौन है?....


नीलकंठ - (हाथ में छोटा-सा ब्रीफकेस लेकर नीलकंठ प्रवेश करते हुए)
मैं हूँ माँ, नीलकंठ । (ब्रीफकेस रखकर माता-पिता के चरणों का स्पर्श करता है । दोनों आह्लाद से भर जाते हैं ।)
भोला - (वात्सल्य प्रेम से गद्‌-गद्‌ होकर आशीर्वाद मुद्रा से उसके सर पर हाथ रखते हुए) दीर्घजीवी भव! कुशल से हो न बेटा? कोई कष्ट तो नहीं है...? बैठो,... इसी पर बैठो । (चारपाई पर दोनों बैठ जाते हैं ।)
नीलकंठ - पिताजी, आप लोगों के आशीर्वाद से बिल्कुल ठीक हूँ कल रिजल्ट आया है, फर्स्ट क्लास से पास कर गया ।
भोला - (विभोर होकर आकाश की ओर भक्‍तिभाव से प्रणाम करके) सब परमात्मा का आशीर्वाद है, बेटा !
मुन्‍ना की माँ- (मातृत्व और आनन्द के आवेग से ओत-प्रोत होकर)- हाँ, बेटा! सब उनकी कृपा है । लेकिन तुम इतने दुबले क्यों हो गये?
नीलकंठ - (माँ के समीप आकर) नहीं तो! मैं तो ज्यों-का-त्यों हूँ । (अपना कोट उतारकर चारपाई पर रखता है । बदन पर फटी-चीथड़ी कमीज दीनता प्रकट करती है । माँ की गोद में सोते हुए मुन्‍ना को दुलार करता हुआ)
नीलकंठ - मुन्‍ना! मेरा प्यारा मुन्‍ना
(नीलकंठ की आवाज पहचान कर मुन्‍ना उसकी ओर देखता है, थोड़ा मुस्कराकर माँ की गोद से उतरकर उससे शिकायत कर बैठता है ।)
मुन्‍ना - भैया! तुम बहुत दिन पर आये! बड़ी भूख लगी है । कुछ नहीं खाया है ।


नीलकंठ - (मुन्‍ना का मुख दुलार से चूमकर पैन्ट की जेब से चॉकलेट निकाल कर देता है।) कुछ नहीं खाया है? मेरे साथ बैठकर खायेगा? (मुन्‍ना अति प्रसन्‍नता के साथ चॉकलेट खाने लगता है । नीलकंठ माँ से)- सचमुच, माँ! मुझे भी भूख लगी है । (एकाएक माँ उदास हो जाती है और भोला मर्माहत होकर शीश झुकाकर दोनों हाथ सर पर रख लेता है ।)
नीलकंठ - (माता-पिता का भाव ताड़कर कृत्रिम हँसी हँसते हुए)- अच्छा, ऐसी बात है! दरिद्रता देवी की आराधना में उपवास!! (कमीज की जेब से बीस रूपये का नोट माँ की ओर बढ़ाते हुए)- लो, माँ । बस, यही बीस रूपये मेरे पास बचे हैं । कुछ प्रबन्ध लो । (चिन्तामग्न माँ किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी नोट की तरफ देखती रहती है ।) -माँ! सोचती क्या हो? चिन्ता मत करो । अब गरीबी के दिन जाने वाले ही हैं । एम.ए. की परीक्षा पास कर गया हूँ........ नौकरी लगी कि दुःख के दिन गये ।
मुन्‍ना - कल से कुछ नहीं खाया है भैया! बड़ी भूख लगी है ।
माँ - चुप रह बेटा! देख तेरा भैया रूपया लाया है । जाती हूँ आटा लाने... रोटी सेंक दूँगी । (रूपया लेकर प्यार से मुन्‍ना को चूम कर चली जाती है।)
नीलकंठ - (मुन्‍ना के निस्तेज मुख; दुबले-पतले, सूखे हाथ-पैर और बेढंगा सा निकला हुआ पेट देखकर) - वास्तव में कोई महापाप अगर है, तो वह है..... गरीबी । यही गरीबी,... महापाप!! सामान्य मनुष्यों में पशुता का अमिट संस्कार भर देता है ।... फिर, यही उत्कट गरीबी एक दिन सभी अपराधों की जननी बन जाती है । गरीबी को पाल-पोसकर अपनी सभ्यता, अपनी संस्कृति और अपने आध्यात्म पर गर्व करनेवाली इस दुनिया को धिक्‍कार है । पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-बहन के स्वाभाविक मानवीय पवित्र सम्बन्ध में कटुता भरनेवाली यही राक्षसी गरीबी है!... गरीबी!!
भोला - बेटा! कैसी अटपटी बातें करता है! लोग अपने भाग्य-कर्म से गरीब और अमीर बनते हैं । इसके लिये किसी को दोष देना उचित नहीं है । परमात्मा की यही इच्छा है ।
नीलकंठ - (थोड़ा मुस्कुराकर शिष्टाचार के साथ)- पिताजी, आपकी यह सोच केवल आपकी ही सोच नहीं है । यह बहुसंख्यक लोगों की सोच है । मैं भी बहुत दिनों तक आपकी तरह गरीबी को प्रभु की इच्छा ही समझता था । यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र को पढ़ने तथा मनन करने का अवसर मिला, तो सत्य परखने की आँखें खुल गई हैं ।
भोला - तब तुम्हीं बताओ । यदि गरीबी का कारण निजी भाग्य-रेखा और परमात्मा की इच्छा नहीं है, तो क्या है?
नीलकंठ - पिताजी, निजी भाग्य-रेखा और परमात्मा की इच्छा को गरीबी का कारण मानना घोर अन्धविश्‍वास है । इसको सामन्तों, पूँजीपतियों और अज्ञानी धार्मिक ठेकेदारों ने अपने स्वार्थों की रक्षा के लिये समाज में फैलाया है । इसी अन्धविश्‍वास के कारण हमारे यहाँ आर्थिक क्रान्ति नहीं होती, कपटाचारी लोग ऐश करते हैं और बहुसंख्यक जनता गरीबी में घुट-घुटकर मरती है ।
भोला - ऐसा अनर्थकारी अंधविश्‍वास तो असली कारण क्या है?
नीलकंठ - (संकेत पूर्वक) पिताजी! गरीबी का पहला कारण है, स्वार्थी नेताओं के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर दोषपूर्ण अर्थनीति को कार्यरूप देना जिसमें धन के उत्पादन और वितरण दोनों की प्रदूषित प्रक्रिया भीषण विषमता के पोषक हैं ।
दूसरा कारण है, पूँजीपतियों की स्वार्थ की रक्षा के लिये बिकाऊ पंडितों के माध्यम से परमात्मा की अवधारणा और शास्त्रों के निर्देश का दुरूपयोग करना एवं मिथ्या लोक-कथाओं के द्वारा गरीबी को महिमा-मंडित करते रहना, जिसके कारण विषमता के विरूद्ध आन्दोलन का अवरूद्ध हो जाना ।
तीसरा कारण है, भौतिकवादी नास्तिक दर्शन के प्रचार-प्रसार से अधिकतर नास्तिक दर्शन के प्रचार-प्रसार से अधिकतर लोग अधार्मिक और अनैतिक ढंग से दूसरों के धन का अपहरण करते हैं तथा अर्थतन्त्र पर एकाधिकार स्थापित कर लेते हैं । (इसी बीच मुन्‍ना चॉकलेट खाते-खाते बाहर चला जाता है ।)
भोला - समाज के लोग परमात्मा की इच्छा और निजी पाप-कर्म के फल को ही गरीबी का कारण क्यों मानते हैं?


नीलकंठ - शास्त्रों की अपव्याख्या के व्यापक प्रचार के कारण । पिताजी, परमात्मा तो पूर्ण चैतन्य सर्वशक्‍तिमान हैं । वे इन्द्रियज्ञान से अतीत अदृश्य सत्ता हैं । वे सृष्टि के सुनियन्ता हैं और उनके सुव्यवस्थित सिद्धान्त के अधीन प्रारब्ध, शुभ या अशुभ कर्म के अनुरूप मनुष्यों को केवल मानसिक तल पर ही सुख का भोग अथवा दुःख का भोग प्राप्त होता है । किन्तु, सभी सम्प्रदाय के माफिया सरदारों (आत्मज्ञान से हीन, अल्पज्ञ स्वार्थी पंडे, पुजारी, पुरोहित, महंथ, ग्रंथी, मुल्ला-मौलवी, पोप-पादरी इत्यादि) के द्वारा इस सूक्ष्म दार्शनिक तथ्य की व्याख्या गलत रूप से की गई है । जिसके बल पर सबके मन में आप की जैसी गलत सोच ही बैठा दी गयी है ।
भोला - तुम कहना चाहते हो कि मानवीय गलत अर्थ-व्यवस्था का ही परिणाम होता है- अमीरों की श्रेणी और गरीबों की श्रेणी का बनना और बिगड़ना ।
नीलकंठ - हाँ, पिताजी । अमीर-गरीब बनना मानवीय व्यवस्था है । परमात्मा की इच्छा या पुण्य-पाप का फल नहीं है । ईश्‍वरीय विधान के अन्तर्गत कर्मफल के रूप में सुख और दुख का भोग मिलता है । अमीरी में भी कर्महीन (अर्थात्‌ कर्त्तव्यच्युत) मनुष्य असीम दुःख भोगता है और अटूट गरीबी में भी धर्म-कर्मप्रधान मनुष्य अपार सुख भोगता है ।
(नेपथ्य से गीत का स्वर सुनाई पड़ता है- “धन का बिस्तर मिल जाये, फिर भी नींद को तरसे नैन ।
काँटों पर भी सोकर आये, किसी को मन का चैन ।
यह है प्रभु की कारीगरी, तू क्यों होता गम्भीर !
अरे, कोई कारण होगा.... अरे, कोई कारण होगा.......।”)


भोला - हाँ, बेटा । तुम्हारी बात बिल्कुल ठीक लगती है । मैं भी कभी-कभी सोचा करता था- परमात्मा तो सब के पिता हैं, जो दया के सागर हैं, समदर्शी हैं, न्यायकर्त्ता हैं । फिर वे खुद एक बेटा को धन्‍नासेठ और दूसरे बेटा को दरिद्र कैसे बना सकते हैं? एक बेटा को शिक्षा, दूसरे बेटा को अशिक्षित, एक बेटा को साधु, दूसरे को हत्यारा-डकैत कैसे बनायेंगे । तुम्हारी बात ही सच है । ये सारे विभेद और विषमता मनुष्य के व्यक्‍तिगत या सामूहिक सुकर्मों और कुकर्मों का परिणाम हुआ करते हैं ।
( मननशील मुद्रा में सोचने लगता है । थोड़ा रूककर थोड़ी अधीरता से)
अरे, मुन्‍ना तो बाहर चला गया । उसको ले आओ । बेचारा कई दिनों का भूखा है । किसी से खाना माँगने न चला जाय !
नीलकंठ - (मुन्‍ना को खोजने के लिये बाहर जाते हुए-) मुन्‍ना! ओ मुन्‍ना!!


- अर्जुन नारायण चौधरी


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