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Today : 18-05-2012 
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लिपि और भाषा

- डॉ. हरदेव बाहरी
‘भाषा’ शब्द भष्‌ धातु से बना है, जिसका अर्थ है बोलना । भाषा का आधार ध्वनि है जो मानव मुख से निकलती हो और अर्थवान्‌ हो । यह श्रव्य और कर्णगोचर होती है । लिपि का आधार लिखित संकेत होते हैं । लिपि दृश्य और दृष्टिगोचर होती है । एक ही भाषा को लिखने के लिपिचिन्ह कई तरह के हो सकते हैं; जैसे- हिन्दी देवनागरी में तो लिखी ही जाती है; इसे बँगला, तमिल या रोमन अक्षरों में भी लिख सकते हैं । भाषा को एक व्यक्‍ति समझा जाये तो लिपि उस व्यक्‍ति का चित्र या फोटो है, जो अन्तर एक व्यक्‍ति और उसके फोटो में है, वही अन्तर भाषा और लिपि में है । भाषा असल है, लिपि उसकी नकल है । ध्वनि का परिसर बहुत सीमित होता है, वह कुछ मीटर तक पहुँच पाती है, रात में या खुले में उसकी पहुँच कुछ अधिक दूर तक होती है, परन्तु रास्ते में रूकावट हो तो वह दूरगामी नहीं हो पाती । भले ही आज रेडियो और टी०वी० ने ध्वनि को निःसीम बना दिया है, फिर भी लिपि की तुलना में वह दिशा और काल की सीमा में अधिक बँधी हुई होती है । ध्वनि तात्कालिक, नश्‍वर और वायवी है, लिपि चिरस्थायी है । युग-युग का साहित्य उसमें ही सुरक्षित है । ध्वनि की पकड़ नहीं है, लिखित विषय को हम बार-बार देख सकते हैं, उस पर चिन्तन-मनन कर सकते हैं ध्वनि उपस्थित व्यक्‍ति के लिए है, परन्तु लिपि के द्वारा प्रत्येक व्यक्‍ति अपनी बात कहीं भी, देश-विदेश में पहुँचा सकता है । आनेवाली पीढ़ियों तक के लिए अपने भाव और विचार छोड़ सकता है । हमारी साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक मर्यादाएँ लिपि के कारण पीढ़ियों से होती हुई हम तक पहुँची हैं और उनके आधार पर हम आगे बढ़े हैं । यह उसका ऐतिहासिक महत्व है । प्रत्येक लिपि का अपना भी एक ऐतिहासिक महत्व होता है । देवनागरी लिपि को ही ले लें । इसका जन्म ब्राह्मी लिपि से हुआ है जो संसार की लिपियों में सबसे पुरानी है, और वैदिक युग से चली आ रही है । इसी में हमारा वैदिक साहित्य, पौराणिक साहित्य, हमारे शास्त्र, हमारे महाकाव्य, हमारी संस्कृति, हमारे सर्वयुगीन विचारों का लेखा-जोखा सुरक्षित है ।

देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा का मानकीकरण

यदि लिपि न हो तो किसी भी भाषा का रूप स्थिर नहीं हो सकता । बोलचाल की भाषा में उच्चारण, व्याकरण और वाक्ययोजन में विविधता रहती है । ज्यों-ज्यों भाषा के लिखित रूप का विस्तार होता है, त्यों-त्यों उसमें एकरूपता का तकाज़ा बढ़ता जाता है । हिन्दी के मानकीकरण में वर्तनी का मुद्दा सबसे अधिक महत्वपूर्ण है और इसका सीधा सम्बन्ध लिपि से है । देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता के कारण हमारी वर्तनीगत समस्याएँ अधिकांशतः सुलझ गई हैं । यह अलग बात है कि लोग अपनी पुरानी आदतों के कारण उन नियमों का पालन नहीं कर पा रहे हैं । व्याकरण के मानकीकरण में भी देवनागरी लिपि ने अपना योग दिया है । पहली बात यह है कि व्याकरण प्रायः लिखित भाषा का होता है । व्याकरण के सारे नियम एक साथ लिपिबद्ध होकर हमारे सामने आ जाते हैं । उदाहरण-स्वरूप पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने के लिए सभी प्रत्ययों को एक जगह लिखकर समझ-समझा सकते हैं कि- नी, आनी, इया, इन आदि स्त्री प्रत्यय हैं, जैसे मोरनी, नौकरानी, चिड़िया, धोबिन में । हम क्रिया की सारी कालरचना लिपिबद्ध करके एक पृष्ठ पर या ब्लैकबोर्ड पर दिखा सकते हैं । ऐसे में समझना और याद कर लेना सुगम हो जाता है । फिर लिपिबद्ध कर लेने पर ही हम समय-समय पर निरीक्षण कर सकते हैं कि किन व्याकरणिक कोटियों में मानक रूप पर स्थिर हो गए हैं और किन में शेष हैं । हमारे शब्दकोष भी तो लिपिबद्ध हैं । ऐसा न हो तो हम जान नहीं पाते कि शब्दभंडार के मानकीकारण की क्या-क्या समस्याएँ हैं और उनको कैसे सुलझाया जाये ?



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