संपादकीय
प्रिय पाठक बन्धुओं समय दर्पण के इस १६ वें अंक की सफलता पर मैं आपको सहृदय धन्यवाद देता हूँ । इस पत्रिका के हर अंक में हमारा यह प्रयास होता है कि कुछ नये तथ्यों और सामग्रियों को आपके सामने प्रस्तुत करें और कुछ अनछुए और उपेक्षित पहलुओं को आपके सामने लेकर आयें ।
ऐसा प्रायः देखने को मिलता है कि जब किसी का किसी से मतलब रहता है तो अपेक्षित व्यक्ति अपने स्वार्थ वश सामने वाले व्यक्ति को भरपूर खुश करने की चेष्टा करता है । उसे हर लुभावने व मीठे आश्वासन देता है पर मतलब पूर्ण होने के बाद वह अपने वादों व आश्वासनों से विमुख होता नजर आता है । वर्तमान यू०पी०ए० सरकार भी भारत की सम्मानित जनता के प्रति कर्तव्यों से विमुख होती नजर आ रही है । यह वही जनता है जिसने यू०पी०ए० को पूर्ण बहुमत देकर, एक स्थिर और स्थाई सरकार बनाने की क्षमता प्रदान की है । पर अभी एक वर्ष भी नही बीते कि जनता के समक्ष महंगाई, नक्सलवाद और नित्य नये-नये कालाबाजारी व भ्रष्टाचार के पोल उजागर हो रहे हैं ।
कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव 2009 में यह आश्वासन दिया कि विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जायेगा, लेकिन अब तक कांग्रेस (यू०पी०ए०) सरकार ने इस दिशा में भले ही कोई कदम नही उठाया पर आई०पी०एल० जैसे आयोजनों द्वारा देश में बड़े पैमाने पर कानूनी तौर पर कालाबाजारी और सट्टाबाजारी को बढ़ावा दिया है । कांग्रेस के मैनिफेस्टो का स्लोगन था कि
“आम आदमी के बढ़ते कदम,
हर कदम पर भारत बुलन्द"
लेकिन आम आदमी तो महंगाई से त्रस्त है और सरकारी गोदामों में अनाज सड़ने की खबर अक्सर मीडिया द्वारा बताई जाती है । बजट पेश होने के पूर्व यू०पी०ए० सरकार ने अपनी दूसरी पारी का पहला तोहफा जनता को भेंट किया है । सरकार ने संसद सत्र शुरु होने के ऐन पहले पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में भारी वृद्धि की घोषणा की है । इसके तहत पेट्रोल में चार और डीजल में दो रुपये प्रति लीटर मूल्य का इजाफा सरकार ने रातोंरात कर दिया है । तुर्रा यह कि यह तोहफा जनता को उस समय दिया गया, जब उसकी कमर महंगाई के बोझ से पहले ही दोहरी हो चुकी है और मानसून अभी भी आँखमिचौली खेल रहा है । हैरत यह है कि कीमतों में वृद्धि का निर्णय ऐसे वक्त पर लिया गया, जब जनता यू०पी०ए० सरकार से राहत की उम्मीद कर रही थी । लेकिन सरकार का आगाज देखकर जनता स्तब्ध हो गयी है । उसे समझ में नही आ रहा है कि ऐसी स्थिति में अब सरकार से क्या आशा रखी जाये ?
इस महंगाई में भूखे पेट आम आदमी के कदम कैसे बढ़ेंगे ? अलबत्ता इस सरकार ने नरेगा जैसी योजना बनाकर एक सराहनीय दिशा में कदम बढ़ाया है पर शुरू से ही पूंजीपतियों की सरकार बनकर रहने वाली ये सरकार इस योजना को सही दिशा में सार्थक अंजाम तक पहुँचाने में किस हद तक सफल रहती है यह कहना मुश्किल है । नक्सलवाद के मामले में अपने ही देश के भीतर नक्सलवादियों
द्वारा हर हमले में इस सरकार को मुंह की खानी पड़ी, जिसमें अनगिनत सुरक्षा बल के जवानों ने जानें गवाईं हैं । इसके बावजूद भी यह सरकार इसके प्रति कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही है । ऐसी स्थिति में सरकार से बाहरी आतंकवादियों से सुरक्षा की क्या उम्मीद की जाय ?
अन्त में मैं सिर्फ यही कहना चाहूंगा कि देश की जनता को अपना भला-बुरा स्वयं सोचना होगा उसे यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि देश के नेता या सरकार ही उनके बारे में सोचेंगे । मैं अपने पाठक बन्धुओं को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त करता हूं कि अब तक उन्होंने हमारा साथ दिया और मैं आशा करता हूं कि आगे भी आप ऐसे ही हमारा साथ देंगे और मेरा निवेदन है आपसे कि आप अपने सुझावों से भी हमें अवश्य अवगत करावें, जिससे हम समय दर्पण के हर अंक को आपके अनुरूप बना सकें ।
सधन्यवाद आपका कृष्ण गोपाल मिश्र