मुझे नहीं पता
मैं कौन हूँ क्या हूँ?
मुझे तो नहीं पता, तुम्हें तो है पता ।
रोती हूँ, उदास रहती हूँ, आहें भरती हूँ क्यों?
तड़पती हूँ, सिसकती हूँ किसलिये?
क्या चाहती हूँ क्या करना है मुझे ।
मुझे तो नहीं पता, तुम्हें तो है पता ॥
मैं सोचती हूँ समझाती हूँ,
भरसक कोशिश करती हूँ किसलिये?
मुझे नहीं पता, तुम्हें तो है पता ॥
श्रवण कीर्तन, भजन, साधन करती हूँ, क्यों?
सत्संग, चर्चा, पठन, ध्यान, एकान्त सेवन करती हूँ क्यों?
पाने को तुझे !
मुझे नहीं पता, तुम्हें तो है पता ॥
कैसे रहना चाहिये?
कैसे रहूँ जग और घर में?
नाकाम हो चुकी हूँ क्यों?
कैयों को नहीं भाई, जगने की रूसवाई, क्यों?
मुझे तो नहीं पता, तुम्हें तो है पता ॥
फिर भी
कभी मन मयूर झूम उठता है ।
आनंद में दिल नाच उठता है ॥
दर पे तेरे आकर बैठी ।
सब चल रही तेरी मर्जी ॥
क्योंकि मैं हो गई लापता ।
अब सब कुछ तुम्हें तो है पता ॥
- श्रीमती राजकुमारी धूत
‘प्रेम पियासी’