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Today : 18-05-2012 
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वैदिक धर्म


वेदोऽखिलो धर्ममूलम्‌ (वेद धर्म का मूल है) ।
धर्मस्य त्रयः स्कन्धा यज्ञो दानं तपः
(धर्म के तीन स्कन्ध हैं- यज्ञ, दान और तप)


धर्म सबका एक है । कभी दो नहीं हो सकते अर्थात्‌ सार्वभौम धर्म । सार्वभौम धर्म उसे कहते हैं जिसे समस्त संसार के लोग विविध सम्प्रदायों के मतानुयायी भी बिना किसी संकोच के स्वीकार कर सकें । धर्म उस शाश्‍वत सत्य को कहते हैं जो व्यक्‍ति का सर्वांगीण विकास करके मानव को मानव से जोड़े ।

मनु महाराज ने मनुस्मृति के धर्म के दस लक्षण बताये हैं ।
धृति क्षमता दमोअस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या, सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌ ।


1* धृति - सदा धैर्य रखना और सुख दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान में भी धर्म (कर्त्तव्यपालन) को न छोड़ना ।

2* क्षमा - अपराधी के प्रति दयालु रहना, क्रोध न करना और बदला लेने के विचार को छोड़ देना ।

3* दम- मन को सदा धर्म में प्रवृत रखते हुए अधर्म में जाने वलए मन की वृत्ति को रोकना ।

4* अस्तेय - चोरी त्याग अर्थात्‌ बिना आज्ञा से परपदार्थ का ग्रहण न करना ।

5* शौच - राग द्वेष मोह आदि के त्याग से आभ्यान्तर तथा पानी से बाह्य शरीर को शुद्ध रखना ।

6* इन्द्रियनिग्रह - अधर्माचरणों से रोक के इन्द्रियों को सदा धर्म में चलाना ।

7* धी - बुद्धिनाशक पदार्थो, दुष्टों का संग, आलस्य, प्रमाद आदि को छोड़ के श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन, सत्पुरूषों का संग, योगाभ्यास, धर्माचरण, ब्रह्मचर्य आदि शुभकर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ।

8* विद्या - पृथ्वी से लेके परमेश्‍वर पर्यन्त यथार्थज्ञान और उनसे यथा योग्य उपकार लेना, इससे विपरीत अविद्या है ।

9* सत्य - मन, वचन, कर्म से सत्य बोलना अर्थात जो पदार्थ जैसा हो उसको वैसा ही समझना बोलना और करना सत्य कहलाता है ।

10* अक्रोध - क्रोधादि दोषों को छोड़कर शान्ति के गुणों को ग्रहण करना धर्म का लक्षण है ।



इस दशलक्षणयुक्‍त पक्षपातरहित न्यायचरण धर्म का सेवन चारों आश्रम वाले करें । और इसी वेदोक्‍त धर्म ही में आप चलना और दूसरों को समझाकर चलाना सन्यासियों का विशेष धर्म है । इस प्रकार धर्म के इन दश लक्षणों पर विचार किया जाये तो संसार के किसी भी सम्प्रदाय या मत को मानने वाले व्यक्‍ति को धर्म के इन दस लक्षणों को अपनाने में कोई आपत्ति नहीं होगी । मनु महाराज नीति, नियम और विधान के निर्माता थे, उन्होंने धर्म के दश लक्षण इसी दृष्टि से किये परन्तु इस विषय में वे को परम-प्रमाण बताया । इससे यह ज्ञात होता है कि सार्वभौम धर्म वह है- 1. जो ईश्‍वर का दिया आदेश हो । 2. सृष्टि के नियमों के अनुकूल हो । 3. सब देश, काल और मानवता के लिए हो । 4. वह मानवनिर्मित न हो । इन सारी कसौटियों पर केवल वैदिक धर्म ही खरा उतरता है । अतः वही सार्वभौम धर्म है । महर्षि देव दयानन्द ने कितना सुन्दर लिखा है- ‘मैं अपना मन्तव्य उसी को मानता हूँ जो तीन काल में सबको एक-सा मानने योग्य है । मेरा कोई नवीन कल्पना वा मत-मतान्तर चलाने का लेश मात्र भी अभिप्राय नहीं है । किन्तु जो सत्य है उसको मानना, मनवाना और जो असत्य है उसको छोड़ना और छुड़वाना मुझको अभीष्ट है । यदि हम आर्य लोग वेदोक्‍त धर्म के विषय में प्रीतिपूर्वक पक्षपात को छोड़कर विचार करें तो सब प्रकार का कल्याण ही है । यही मेरी इच्छा है’

प्रश्न - संसार में जो अनेक मजहब, पन्थ एवं सम्प्रदाय हैं वे कब से रचना में आए हैं तथा किसने बनाए हैं?

उत्तर - महाभारत के भयानक युद्ध के पश्‍चात्‌ जब विश्‍व में वैदिक विद्वानों की कमी आई एवं सर्वसाधारण लोगों में अविद्या व ज्ञानता की काली घटा छाई तो साढ़े चार हजार वर्ष के भीतर ही सभी वेदविरूद्ध मत व पन्थ रचना में आए तथा भिन्‍न-भिन्‍न समय में भिन्‍न भिन्‍न व्यक्‍तियों ने बनाए ।




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