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Today : 18-05-2012 
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महावीर वाणी

-समय दर्पण ब्यूरों
* जो वन्दना और नमस्कार योग्य हैं, पूजा और सत्कार के योग्य हैं और मोक्ष जाने के योग्य हैं, वे अरहंत भगवान कहलाते हैं ।

* मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले योगों को रत्‍नत्रय को जो साधु सर्वकाल अपनी आत्मा से जोड़े और सर्व जीवों में समभाव को प्राप्त हों, वे मुनि भाव-साधु कहलाते हैं ।

* जैसे कुश की नोक पर लटका हुआ ओस-बिन्दु थोड़ी ही देर टिकता है, वैसे ही मनुष्य जीवन भी । इसलिए हे गौतम! समय भर के लिए भी प्रमाद मत कर ।

* मनुष्य शील-सम्पन्‍न हो जाने पर भी साधु पुरूषों का संसर्ग नहीं पाता । यदि वह भी कभी पा जाता है तो सम्यक्त्व का पाना अत्यन्त दुर्लभ है ।

* जो आत्मा है, वह विज्ञाता है । जो विज्ञाता है, वह आत्मा है । जिससे जाना जाता है । वह आत्मा है । जानने की शाक्‍ति से ही आत्मा की प्रतीप्ति होती है ।

* जीव सबको जानता और देखता है, सुख की इच्छा करता है, दुख से भयभीत होता है, हित अथवा अहित करता है और उनके फल को भोगता है ।

* जो सुखाकांक्षी होता है राग-द्वेषादि से मलिन और काम-भोगों में मूर्च्छित होता है, वह भोगों को न भोगता हुआ भी परिणामों के कारण कर्मों से बंध जाता है ।

* अपना दुराचार मनुष्य का जो अनिष्ट करता है, वैसा अनिष्ट कण्ठ-छेदन करने वाला शत्रु भी नहीं करता ।

* जो व्यक्‍ति दुर्जय संग्राम में सहस-सहस्त्र शत्रुओं को जीतता है, उसकी अपेक्षा जो केवल अपनी एक आत्मा को जीतता है, उसकी यह विजय श्रेष्ठ है ।

* अनाचार का सेवन कर लेने पर उस पर पर्दा न डालें और न अस्वीकार करें, परन्तु सदा पवित्र, प्रगट, अनासक्‍त और जितेन्द्रिय रहें ।

* क्रोधावेश में न बोले । बहुत न बोले । काल के नियम से स्वाध्याय करें और उसके बाद अकेला ध्यान करें ।




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