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Today : 18-05-2012 
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भारतीय राजनीति और गठबंधन सरकारें


भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है । यहां के संविधान के अनुसार सभी वयस्क लोग (जो 18 वर्ष की आयु से ऊपर के हैं चाहे वे स्त्री हो या पुरुष) उनको अपना मत देने का अधिकार है । जिसके आधार पर भारत के सभी नागरिक को अप्रत्यक्ष रूप से सरकार के सभी फैसलों में शामिल होने का हक होता है ।

भारत का लोकतंत्र अमेरिका के लोकतंत्र की तरह नहीं है जहां पर अध्यक्षात्मक सरकार होती है केवल दो पार्टियां ही होती हैं, राष्ट्रपति सर्वेसर्वा होता है । भारत में बहुदल की व्यवस्था की ग‌ई है को‌ई भी व्यक्ति अपनी पार्टी बना सकता है तथा को‌ई भी चुनाव में खड़ा हो सकता है । उनके लि‌ए कुछ शर्तें रखी ग‌ई हैं । जैसे - वह भारत का नागरिक हो । उसकी उम्र 25 वर्ष हो या उससे अधिक हो । वह किसी प्रकार से अपराधी ना ठहराया गया हो, उसकी मानसिक स्थिति ठीक हो इत्यादि । यहां पर भी ब्रिटेन की तरह संसदीय प्रणाली है । यहां के संसदीय प्रणाली को दो सदनों में बाँटा गया हैं ।

उच्च सदन - जिसे राज्य सभा कहते हैं, तथा निम्न सदन जिसे लोक सभा कहते हैं । यहां पर संविधान के अनुसार दोनों सदनों का चुनाव हर पांच वर्ष पर कराने का प्रबन्ध है, परन्तु लोकसभा चुनाव यदा-कदा अपरिहार्य कारणों से जब सरकार अल्पमत में आती है और राष्ट्रपति सरकार को बर्खास्त कर देता है तो ऐसी स्थिति में मध्यावधि चुनाव कराने का भी प्रावधान है । लोक सभा का चुनाव प्रत्येक पाँच वर्ष पर जनता के द्वारा होता है । इसमें कुल ५५२ सीटें हैं, जिसका एक तिहा‌ई उम्मीदवार किसी पार्टी के पास होने पर वह सरकार बना सकती है । गठबंधन सरकार तब बना‌ई जाती है जब किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता तब सबसे बड़ी पार्टी को राष्ट्रपति द्वारा सरकार बनाने के लि‌ए आमंत्रित किया जाता है (यह राष्ट्रपति के विवेक पर निर्भर करता है) ताकि वे पार्टी कुछ और दलों के साथ मिलकर सरकार बना सकें । भारतीय राजनीति में कांग्रेस के अलावा अभी तक केन्द्र में किसी भी एक पार्टी को पूरा बहुमत नहीं मिला है । जिससे गठबंधन की भूमिका सामने आने लगी है । भारत में क‌ई बार गठबंधन सरकार देखने को मिली, लेकिन गैर कांग्रेसी सरकार मात्र एक बार पूरे पाँच वर्ष श्री अटल बिहारी बाजपेयी के द्वारा चलायी ग‌ई ।

1977 का चुनाव :- और गठबंधन सरकारें

12 नवम्बर 1967 को कांग्रेस दो भागों में बंट गया था । कांग्रेस (आर) आर यानी रिक्विंजिशनिस्ट कांग्रेस (ओ) ओ यानी ऑर्गेना‌इजेशन । 1975 में भारत ने आजादी के बाद सबसे बड़े राजनीतिक संकट का अनुभव किया । 26 जून को इंदिरा गांधी ने पूरे देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी । क्या को‌ई और विकल्प नहीं था, जैसा इंदिरा गांधी बता रही थीं, या फिर यह उनकी बढ़ती हु‌ई निरंकुशता जैसा विपक्षी दल आरोप लगा रहे थे । 18 जनवरी 1977 को श्रीमती गांधी ने अचानक घोषणा की कि लोकसभा के चुनाव मार्च में करा‌ए जा‌एंगे । जनवरी 1977 में जेल से बाहर आने के तुरंत बाद विपक्षी नेता‌ओं ने कांग्रेस (ओ) जन संघ भारतीय लोकदल (बी‌एलडी) और सोशलिस्ट पार्टी के एक न‌ई जनता पार्टी में विलय की घोषणा की । २ फरवरी १९७७ को जगजीवन राम, एच. एन. बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी ने कांग्रेस से निकलकर कांग्रेस फार डेमोक्रेसी (सी‌ए फडी) का गठन किया, डी‌एम के अकाली-दल और सीपी‌एम के साथ इन लोगों ने जनता पार्टी से मिलकर एक साझा मोर्चे का गठन किया ताकि कांग्रेस और उसके सहभोगियों सीपी‌आ‌ई और ए‌आ‌ई डी‌एमके को मार्च में होने वाले चुनाव में सीधी टक्कर दी जा सके । कांग्रेस को इस चुनाव में भारी धक्का पहुंचा । सात उत्तरी राज्यों की 234 सीटों में से इसे मात्र दो सीटें प्राप्त हु‌ईं इंदरा और संजय दोनों ही चुनाव हार ग‌ए । वैसे दक्षिण भारत में 1971 में मिली 70 सीटों के मुकाबले 12 सीटें प्राप्त हु‌ईं । चुनाव के ठीक बाद कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी का जनता पार्टी में विलय हो गया ।

प्रधानमंत्री के प्रश्न पर तीन उम्मीदवार-मोरारजी देसा‌ई, चरण सिंह और जगजीवन राम के बीच संकट पैदा हो गया । लेकिन जयप्रकाश नारायण और जी.वी. कृपरानी के विचार से मोरारजी देसा‌ई प्रधानमंत्री बने ।

1978-79 आते-आते आंतरिक कलह सामने आने लगा । प्रत्येक राजनीतिक घटक अधिक-से अधिक संभव राजनीतिक और प्रशासनिक स्थान पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहा था । जनता सरकार और पार्टी में गुटों के बीच संघर्ष ने १९७९ के मध्य बहुत ही गंभीर स्वरूप ले लिया । 30 जून 1978 को गृहमंत्री चरण सिंह को मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के लि‌ए मजबूर कर दिया गया और फिर बाद में जनवरी 1979 में वित्तमंत्री बनाकर वापस भेज दिया गया । उन्होंने सोशलिस्टों की मदद से पार्टी और सरकार जुला‌ई 1979 में तोड़ दी । जनसंघ के सदस्यों द्वारा जनता पार्टी और आर एस एस की दोहरी सदस्यता छोड़ने से इनकार करने के मसले पूरे समाजवादी जनता पार्टी और सरकार से अलग हो ग‌ए । अल्पमत में आने के बाद मोरारजी देसा‌ई ने 15 जुला‌ई को त्यागपत्र दे दिया ।

एक सप्ताह बाद चरण सिंह ने कांग्रेस यू के चवण सेमा और कुछ समाजवादियों के गठबंधन बनाकर सरकार का गठन किया जिसमें कांग्रेस (आ‌ई) सीपी‌आ‌ई बाहर से समर्थन दे रहे थे । 20 अगस्त को विश्वासमत से एक दिन ही पहले इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया ।

राष्ट्रीय मोर्चा सरकार :- 1986-10 और गठबंधन सरकारें

बोफोर्स कांड ने राजीव की कुर्सी हिला दी थी लेकिन उनके पहले फेयर फैक्स विवाद राजीव के वित्तमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा एक अमेरिकी डिटेक्टिव (जासूसी) एजेंसी फेयर फैक्स की नियुक्ति से खड़ा हु‌आ । फेयर फैक्स को भारतीय द्वारा विदेशी बैंकों में विदेशी मुद्रा के गैर कानूनी रूप से जमा करने की जांच का काम सौंपा गया था । दूसरा विवाद- भारत ने पश्चिम जर्मनी से १९८१ में चार पनडुब्बियां खरीदी थीं । वह दो और खरीदना चाहता था, और कीमतों में कुछ कटौती की मांग की, लेकिन जहाज मार्ड ने यह कहते हु‌ए इनकार कर दिया कि उसे बिक्री ७ फीसदी भारी ड्‍यूटी देनी पड़ेगी । वी.पी. सिंह उस समय रक्षा मंत्री थे, बिना राजीव से पूछे जांच का आदेश दे दिया । वी.पी सिंह की कैबिनेट में आलोचना की ग‌ई और उन्होंने जल्द ही सरकार से इस्तीफा दे दिया । विरोधी पक्ष एवं प्रेस ने इसे वी.पी. सिंह को ईमानदार बना दिया ।

वी.पी. सिंह के इस्तीफे के कुछ दिनों बाद 16 अप्रैल 1987 को सबसे पहले स्वीडिश रेडियो पर घोषित हु‌आ कि फ्रांसीसी तोप के मुकाबले स्वीडेन की बोफोर्स कंपनी की 410 तोपों को खरीदने के लि‌ए भारतीय अफसरों एवं कांग्रेस पार्टी के सदस्यों को 60 करोड़ की राशि घूस के रुप में दी ग‌ई । स्वयं राजीव की आलोचना हु‌ई । 1989 के चुनाव में बोफोर्स मामला फिर बड़े जोर से गूंजा । 1989 के चुनाव में भाजपा और वाम पार्टियों के साथ सीटों का तालमेल हो गया । 6 अगस्त 1988 को सात पार्टियों के राष्ट्रीय मोर्चे का निर्माण हु‌आ । 11 अक्टूबर 1988 को जनता दल का निर्माण हु‌आ । जनमोर्चा, कांग्रेस (एस) जनता और लोकदल के विलयन से बना । 2 दिसम्बर 1986 को बड़ी कठिना‌ई से वी.पी. सिंह प्रधानमंत्री बने और देवी लाल उप प्रधानमंत्री बने ।

सरकार को आंतरिक मतभेदों के चलते सरकार चलाने में काफी दिक्कत हो रही थी । चन्द्रशेखर ने प्रधानमंत्री के खिलाफ विरोध प्रकट कर दिया । 1987 में वी.पी. सिंह द्वारा राष्ट्रपति को कथित रूप से पत्र लिखकर बोफोर्स कांड में शामिल होने वाले लोगों का उल्लेख किया । 1 अगस्त 1990 को देवीलाल को बर्खास्त कर दिया गया । 7 अगस्त को मंडल कमीशन रिपोर्ट संसद में पेश की । यह कमीशन जनता सरकार (1977-79) ने नियुक्‍त किया था । मंडल की सिफारिशों में सरकारी नौकरियों और सार्वजनिक क्षेत्रों में 27 फीसदी आरक्षण पिछड़ी जातियों के लि‌ए रखा गया । इस प्रकार आरक्षित श्रेणी 22.5 फीसदी से बढ़कर 49.5 हो ग‌ई । पहले यह 22.5 प्रतिशत आरक्षण जनजातियों या आदिवासियों के लि‌ए था ।

इस बीच भाजपा अपनी योजना पर काम कर रही थी और मंडल ने बेहतर मौका दे दिया । मंडल का व्यापक विरोध देखकर भाजपा ने समर्थन वापस करने की बात शुरू कर दी । 5 नवम्बर को जनता दल में फूट पड़ ग‌ई । 58 सांसदों ने चन्द्रशेखर को अपना नेता चुना । 7 नवम्बर को गैर कांग्रेसी सरकार चलाने की 11 महीने बाद समाप्त हो ग‌ई । 10 नवम्बर 1990 को चन्द्रशेखर की अल्पकालीन सरकार कांग्रेस के समर्थन से बनी । इसकी मात्र एक ही भूमिका थी, तब तक बने रहना, जब तक कांग्रेस अपना समर्थन वापस लेकर चुनावों में भाग लेने का निर्णय न ले ले । 5 मार्च 1999 को समर्थन वापस ले लिया ।

1999 का चुनाव :- और कांग्रेस की गठबंधन सरकारें

19 म‌ई 1999 को चुनाव की घोषणा की ग‌ई । मतदान का एक रा‌उंड पूरा भी हो गया था । इंदिरा गांधी के दुर्भाग्यपूर्ण परिवार पर फिर त्रासदी टूट पड़ी राजीव गांधी चुनाव का एक दौर मद्रास से चालीस कि.मी. दूर श्री पेठबुदुर में आमसभा करने गये थे राजीव से मिलने एक महिला आ‌ई जो अपने कमर में बम बांधे हु‌ई थी । उस बम के धमाके से राजीव के टुकड़े-टुकड़े उड़ ग‌ए । उनकी हत्या से जनित इतनी हमदर्दी पैदा हो सकी कि कांग्रेस को 232 सीटों से और सबसे बड़ी पार्टी का स्थान मिल गया । नरसिंह राव ने पहले तो २१ जून को अल्पमत कांग्रेस सरकार बना‌ई, लेकिन वह धीरे-धीरे बहुमत की सरकार बन ग‌ई और पूरे पाँच वर्ष तक चली ।

1996 के चुनाव :- भाजपा तथा संयुक्‍त मोर्चे की गठबंधन सरकारें

1996 के चुनाव में कांग्रेस को मात्र 140 सीटें मिली । भाजपा ने अपनी सीटें 1999 में 120 के स्थान पर 161 तक बढ़ा लीं । एक अल्पकालीन भाजपा सरकार 16 म‌ई से 1 जून तक बनी रही । लेकिन उसे बहुमत नहीं मिला । इसके बाद एच.डी. देवगौड़ा के प्रधानमंत्रित्व में संयुक्‍त मोर्चे की सरकार बनी । इसका समर्थन कांग्रेस तथा माकपा ने किया । माकपा सरकार के रूप में शामिल हु‌ई । इस प्रकार भारत में पहली बार इंद्रजीत गुप्त के रूप में एक कम्यूनिस्ट गृहमंत्री बना । 30 मार्च 1997 को समर्थन वापस ले लिया लेकिन अपनी सरकार बनाने में असफल रही । उसने फिर एक संयुक्‍त मोर्चें द्वारा सरकार का समर्थन किया जिसके प्रधानमंत्री अब आ‌ई. के गुजराल थे इसका समर्थन फिर वापस ले लिया गया फरवरी १९९८ में न‌ए चुनाव हु‌ए ।

1998 का चुनाव :- भाजपा की गठबंधन सरकार
फरवरी 1998 में न‌ए चुनाव जिसके फलस्वरूप अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी । हालांकि स्वयं भाजपा को मात्र 182 सीटें ही मिलीं । वह तेलुगुदेशम, ए.आ‌ई.ए.डी.एम के तथा तृणमूल कांग्रेस जैसे धर्मनिरपेक्ष पार्टियों का समर्थन हासिल करने में सफल रही । सहयोगियों की बड़ी संख्या के कारण स्थायित्व न आ सका क्योंकि उनकी अलग-अलग मांगे थीं । आखिरकार जयललिता ने ए.आ‌ई. ए.डी.एम के द्वारा दिया गया समर्थन वापस ले लिया । फलस्वरूप अप्रैल 1999 में सरकार विश्वासमत खो बैठी । सितंबर-अक्टूबर 1999 के चुनाव तक काम चला‌ऊ सरकार के रूप में काम करती रही ।


1999 का चुनाव :-और भाजपा की गठबंधन सरकार

1999 के चुनाव भाजपा और सहयोगियों की सीटें 253 से बढ़कर 296 हो ग‌ई, हालांकि भाजपा की अपनी सीटों में को‌ई परिवर्तन नहीं आया । 1999 के चुनाव में 20 से अधिक पार्टियों ने भाजपा के साथ गठबंधन रूप से चुनाव लड़ा । इस चुनाव में क‌ई मुद्दे थे, जैसे देशी बनाम विदेशी, कारगिल युद्ध, कश्मीर, आर्थिक उदारीकरण, इत्यादि । ममता बनर्जी बाद में एन० डी० ए० से अलग हो ग‌ईं । अगर देखा जाय तो अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत के सामने एक उदाहरण पेश किया कि गठबंधन धर्म कैसे निभाया और चलाया जाता है ।

2004 का चुनाव और कांग्रेस की गठबंधन सरकार-

आम चुनाव 2004 में भाजपा गठबंधन की हार हु‌ई 543 में से 335 कांग्रेस नेतृत्व वाली गठबंधन को मिली । इसमें सोनिया गांधी ने एक बार फिर नेहरू की विरासत को आगे बढ़ाया । इस चुनाव में एक आश्चर्य देखने को मिला जब सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री के पद के लि‌ए मनमोहन सिंह का नाम दिया । वामपंथी दल खासकर मार्क्सवादी (भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी) द्रविड़ मुनेत्र कडगम (डी एमके) कांग्रेस के सहयोगी के रूप में चुनाव लड़े । एन.डी.ए के साथ तेलगुदेशम पार्टी और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम थे । बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी किसी भी दल के साथ नहीं ग‌ए । न्यूक्लियर डील के समय गठबंधन ने एक बार फिर अपना खेल शुरू कर दिया वाम मोर्चा ने अपना समर्थन वापस ले लिया । सरकार अल्पमत में आ ग‌ई । बहुमत सिद्ध करने के समय समाजवादी पार्टी ने समर्थन देकर सरकार बचा‌ई ।

2009 का चुनाव और गठबंधन सरकार:-

2009 के चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस को जनता ने चुना 543 में से 206 सीटें प्राप्त हु‌ईं। कांग्रेस के साथ डी० एम० के०,एन० सी० पी० तृणमुल कांग्रेस,जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेस इत्यादि इसमें कुल 10 पार्टियां हैं। 2009 के बाद अब तक क‌ई बार गठबंधन सरकार क‌ई मुद्दे पर साथ नजर आ‌ई लेकिन कुछ मुद्दे जैसे महिला आरक्षण नक्सल समस्या आ‌ई० पी० एल० विवाद गठबंधन में सरकार की मजबूरी देखने को मिली। देखा जाय तो भारत कई भाषा, संस्कृति, जाति एवं क्षेत्रवाद से प्रभावित देश है, इस कारण यहां किसी एक पार्टी का पूर्ण बहुमत में होना आसान नहीं है और किसी पार्टी के अल्पमत का जनाधार होने पर भारत में गठबन्धन सरकार एक अच्छा विकल्प तो है ही साथ ही पार्टियों का एक दूसरे पर अंकुश भी बना रहता है, जिससे बहुत सी कार्य प्रणाली नियन्त्रित होती है ।



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