लोकतंत्र के राजा बाबू
डॉ० भरत मिश्र प्राची
लोकतंत्र की माया अजीब है । सड़क छाप भी इसकी कृपा से राजा बाबू बन चले हैं । कल तक जिनके पास सिर छिपाने को छत नहीं, तन ढकाने को कपड़ा नहीं, रात को भोजन तो दिन को नहीं, दिन कहीं ओर, रात कहीं ओर अर्थात कहने को अपना कुछ भी नहीं, आज उनके पास-दो नहीं कई ठिकाने हो गये हैं । अरबों-खरबों की संपदा के वे मालिक बन बैठे हैं, नौकर-चाकर की जगह अब अंगरक्षक रखने लगे हैं । एक बीवी घर पर है तो एक बाहर । जहाँ जाते हैं वही रम जाते हैं । इस तरह के रंगीन मिजाज से सजी-धजी जिंदगी जीने वाले राजा बाबू कोई और नहीं हमारे जनप्रतिनिधि, जनसेवक ही तो हैं । जिन पर लोकतंत्र की गहरी छाप लगी हुई है । लोक भी इनका, तंत्र भी इनका, फिर किसकी मजाल, जो उनके काले कारनामों की जांच-पड़ताल करे । तेजी से बदलते इनके हालात की परख करे । चंद दिनों में ही सड़क छाप की जिंदगी से राजा बाबू की तब्दील हुई जिंदगी की तहकीकात करे । ये सारे सवाल आज इस लोकतंत्र की अनबूझ पहेली बन चुके हैं ।
सिर पर गांधी टोपी नहीं, आंखों में काले चश्मे, पांव में चप्पल की जगह बूटेदार जूते, हाथ में रूलर लिए बेशकीमती कार से बंदूकधारी अंगरक्षकों के साथ सूट-बूट पहने उतरने वाले को देखकर चौंकिये नहीं, ये कोई और नहीं आपके ही चहेते लोकतंत्र के प्रिय जननेता, जनसेवक, जनप्रतिनिधि आदि संबोधनों से विभूषित लोकतंत्र के सजग प्रहरी राजा बाबू ही तो है । जिनकी आंख मिचौली में सम्पूर्ण विकास समाया है । इनमें से कुछ तो सेवाभाव से जेल की काली कोठरी से अभी-अभी बाहर निकलकर जनता का दुखदर्द दूर करने निकल पड़े हैं । जिन पर अनेक संगीन अपराध के आरोपित दाग तो हैं परन्तु सिद्ध न होने की वजह से सब बकवास हैं ।
जनता जनार्दन है । सुनने को यह उक्ति बहुत ही सारगर्भित तो लगती है । परन्तु लोकतंत्र की इस मायावी नगरी की भूलभूलैया में उलझकर खुद ही अर्थहीन हो गयी है । तभी तो पूजे जा रहे अक्षर देश के ही तस्कर जैसी उक्ति आज चरितार्थ हो चली है । आजादी के बाद बदलते लोकतंत्र के इस स्वरूप ने आजादी पाने के सपनों को मटियामेट कर दिया है । एक गुलामी से मुक्ति मिली तो दूसरी गुलामी ने देश को लोकतंत्र के नाम जकड़ लिया । राजतंत्र में राजा के कुछ उसूल हुआ करते थे । प्रजा के हित के प्रति वफादारी एवं राष्ट्रदोह करने वालों को देश छोड़ने से लेकर मौत तक के खौफनाक दंड के मापदंड जहां निहित थे, वहीं आज प्रजातंत्र में राजतंत्र का नया रूप उभरता दिखाई देने लगा है । जहां जनता की सहानुभूति पाकर लोकतंत्र के नायक जनप्रतिनिधि राजा बाबू बन तो चले हैं परन्तु इनकी नियमावली में प्रजा का हित तो गायब ही है, अनैतिक कार्यो के अन्य सिलसिलों के साथ राजद्रोह से भी जुड़े अनेक प्रसंग प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी हो चले है । फिर भी इनका अभिनन्दन्है । लोकतंत्र के राजाबाबू के पांव जमीन पर नहीं, आसमां पर भी नहीं, आमजन प्रजा के पेट पर पड़े दिखाई देते हैं । जिनके पीछे-पीछे घूमती दिखाई दे रही है और वे ताज के नशे में चूर दिन पर दिन विकास के नाम अपने उदर को बढ़ाते, लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाते, आजाद भारत के सपने देखने वाले गुमनाम अनेक शहीद देशभक्तों की पवित्र भावनाओं को प्रतिघात पहुंचाते विचरित कर रहे हैं । फिर भी देश की जनता से जगह-जगह इन्हें अभिनन्दित होते आसानी से देखा जा सकता है । यह लोकतंत्र की किस माया का स्वरूप है, विचार किया जाना चाहिए ।
मकान मोह, धन मोह, सत्ता मोह एवं विभिन्न प्रकर के मोहों से ग्रसित ये नेता लोकतंत्र के जनप्रतिनिधि है । जिनका अपरिवेश जनसेवक की ओर परिलक्षित होकर आज जिस स्वरूप को उजागर कर रहा है, सभी के सामने है । जिन्हें किसी भी प्रकार का वेतन नहीं, प्रत्याक्ष रूप से जिनके पास जनसेवक कार्य के रूप में कोई आय स्रोत नहीं, फिर भी चंद दिनों में ही अपार संपदा के स्वामी नजर आने लगते है । कार बंगला, बैक बैलेंस आदि की कोई सीमा नहीं, आखिर यह सब जनप्रतिनिधि बनते ही कैसे संभव हो जाता है, जबकि देश का वेतनभोगी/ श्रमिक श्रम करते-करते पूरी जिंदगी बिता देता, फिर भी उसके सपने कभी पूरे नहीं हो पाते । लोकतंत्र की इस मायावी नगरी में कौन सी जादू की छड़ी इन जनप्रतिनिधियों के हाथ लग जाती हैं, जिससे ये सामान्य जिंदगी से ऊपर उठकर राजा बाबू बन जाते हैं जिनके कारनामे असामाजिक एवं देश अहित में होते हुए भी अनुग्रहणीय बनते जा रहे हैं ।
राजस्थान प्रदेश में सांसद एवं विधायकों के पास अवैध रूप से घोषित संपत्ति ब्यौरा से अधिक संपत्ति पाये जाने एवं दो-दो तीन रिहायशी जगहों में मकान होने की चर्चा आज आम चर्चा बन चुकी है । वर्तमान लोकतंत्र के बदले स्वरूप में इस तरह के हालात अब कोई नई पहल नहीं रह गये हैं । प्रदेश ही नहीं पूरा देश इस तरह के हालात की चपेट में समा गया है । किस-किसकी चर्चा की जाय, देशभर में सांसदों व विधायकों के बदले हालात इस बात के गवाह हैं कि लोकतंत्र बनाम राजंतत्र के ये पहरूवे जनप्रतिनिधि नहीं, आज के राजा बाबू हैं । जिनके पास इस तरह की संपदा का होना वैधता का स्वरूप ले चुका है । इन जनप्रतिनिधियों के पास ये बेशुमार दौलत कहां से आई, इनसे कोई पूछने वाला नहीं । एक ही रंग में रंगे हैं । लोकतंत्र का जागरूक स्तंभ भी कभी-कभी दिग्भ्रमित हो जाता है । जो इनके काले कारनामों को उजागर करने के साथ-साथ इन्हें महिमा मंडित करने में भी कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ता । आखिर लोकतंत्र की यह कौन सी अनूझ पहेली है जहां जागरूकता भी अंधेरे का दामन थाम लेती हो । इस तरह के परिवेश का पूरा लुत्फ लोकतंत्र के राजा बाबू ही उठाने में नहीं चूकते, वर्तमान हालात बयां कर रहे हैं ।
आज देश में अपहरण, हत्या, अपराध, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट उग्रवाद प्रगति के चरण बन चुके हैं । इस तरह के परिवेश के लिये कौन जिम्मेवार हैं, विचार किया जाना चाहिए । देश की अस्मिता को बाहरी शक्तियों की ऐन-केन-प्रकारेण चुनौतियां भी मिलने लगी है । जिसके प्रतिकूल प्रभाव देश में घटते स्वावलम्बन के आधार-स्तम्भ एवं बढ़ती बेरोजगारी के चरण के रूप में आसानी से देखा जा सकता है । जनप्रतिनिधियों के पास तो विपुल सम्पदा का भंडार बढ़ता जा रहा है और आम जनता की जेब खाली होती जा रही है । इस तरह के परिवेश, लोकतंत्र के राजाबाबू की ही तो देन है ।
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