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Today : 07-02-2012 
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अर्श (बवासीर) की भोजन के द्वारा चिकित्सा :-


आँवला :- सूखे आँवले का चूर्ण गर्म दूध या जल के साथ सेवनीय है ।
अमरूद :- पका अमरूद खायें । कब्ज दूर होगी । अर्श की पीड़ा हटेगी ।
अमलतासः- इसके जड़ की छाल को पीसकर छाछ के साथ दिन में दो बार एक माह तक सेवन करें ।
अखरोट :- इसके छिलके की भस्म गुरूय रस के साथ सेवन करने से रक्‍तस्रावी बवासीर दूर होती है ।
अपामार्ग (चिरचिरी) :- इसका चूर्ण तीन माशा चावल के धोवन के साथ सवेरे-सायं लें । रक्‍तार्श दूर होगा ।
आम :- आम के पत्ते को पीस कर जल में मिलाकर छान लें तथा मिश्री मिलाकर पीयें । 2. आम की गुठली का चूर्ण शहद या जल के साथ सेवन करने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है । 3. आम के कोमल पत्ते, जामुन के पत्ते तथा ताल मिश्री मिलाकर चूर्ण बना लें तथा उसे बकरी या गाय के दूध में दो बार रोज सेवन करें । अर्श दूर होगा ।
ओल :- ओल, बेल, ईसबगोल का सेवन करें । अर्श रोग से दूर रहेंगे । यह ‘त्रय’- प्रकृति -प्रदत्त देन है । ईश्‍वर का अनुपम प्रसाद है ।
ओलक तम्बाकू :- इससे रोगियोपैथी में एब्रोमा आगस्टा नामक दवा बनी है । इसकी पेड़ की जड़ या छाल को पीसकर उसका रस सेवन करें । लाभ होगा ।
करेला :- इसका रस पीने से कठिन मलावरोध वाले बवासीर में लाभ होता है ।
कुटज (कुरैया) :- इसकी छाल का काढ़ा तक्र या बेल के गूदा के साथ सेवन करें । रक्‍तार्श में लाभ होगा ।
नारियल :- “नारियल फल की जटा के महीन कटे टुकड़े एक किलो । विधि सम्पुट क्रिया से आँच दें । भस्म कर पीस लें । मात्रा : तीन से छः माशे तक । अनुपात : शीतल जल । गुणः रक्‍तार्श, रक्‍त प्रदर आदि के रक्‍त प्रवाह को रोकता है ।”


- वैद्य श्री जयशंकर देव शंकर शर्मा

इमली :- इसके बीजों की भस्म या छाल का चूर्ण बना कर एक ग्राम के अनुपात में गाय या बकरी के दही के साथ दें । इमली के ताजे पुष्पों का रस आधा तोला प्रातः संध्या रक्‍तार्श में सेवनीय है ।
गवार ;- डा० जी० एन० चौहान ने लिखा है कि गवार के पौधों के ग्यारह हरे पत्ते, ग्यारह काली मिर्च पीसकर बासठ ग्राम पानी में मिला कर प्रातः एक दिन में एक बार पीने से वादी बवासीर ठीक हो जाती है ।
गेहूं :- इसके नवजात छोटे पौधे का रस सेवन करने से सभी प्रकार के अर्श रोग में लाभ होता है ।
गुलकन्द :- गुलकन्द को अंजीर के साथ सेवन करने से कब्ज बाले बवासीर दूर होते हैं ।
गुरूचः- इसका रस अखरोट के छिलके की भस्म के साथ लेने से रक्‍तार्श में लाभ होता है ।
गूलर :- ताजे फलों को पत्थर पर पीस कर मिश्री या मधु के साथ लें । गूलर के सूखे फलों को रात्रि में मिट्टी के पात्र में जल के साथ रख दें । प्रातः उसे शिला पर पीस कर मधु या मिश्री के साथ सेवन करेंं ।
जामुन :- जामुन एवं आम के पत्तों का रस मिला कर ताल मिश्री एवं गाय या बकरी के दूध के साथ सुबह-शाम रक्‍तार्श में सेवन करें ।
जीरा :- भूना हुआ जीरा, सेन्धा नमक मिला कर तक्र के साथ, 2. जीरा मिश्री के साथ 3. श्वेत-जीरा दो माशा, काली मिर्च तीन माशा एवं मिश्री 6 माशा को खूब पीस कर दो-दो माशे के अनुपात में नित्य सवेरे-शाम शीतल जल केसाथ लें; 4. काला जीरा भून कर समान भाग बिना भूरा जीरा दोनों का महीन चूर्ण बनाकर प्रातः- संध्या सेवन करने से दोनों तरह के बवासीर में लाभ होता है ।
तक्र (छाछ) :- तक्र पीने से बवासीर नहीं होती । 1. भोजनोपरांत सेंधा नमक डाल कर पीयें । 2. एक गिलास तक्र में आधा तोला गुड़ डाल कर, 3. सोंठ या छोटी पीपल का चूर्ण तक्र के साथ, 4. प्याज का शाक छाछ के साथ या मसूर की दाल का सूप खट्‌टी छाछ केसाथ पीने से सभी तरह के बवासीर दूर होते हैं ।
तिल :- तिल, मक्खन, शीतल जल में या काला तिल-शक्‍कर मिला कर बकरी के दूध में सेवनीय है । इसका तेल अर्श में बाह्य प्रयोगनीय है ।
नीम :- “नीम और महानीम के फल की गिरी, करन्जे के बीज की गिरी, निशोथ, हरड़-जिमीकन्द, श्‍वेत सुरमा, केशर-सभी को ६ माशे लेकर इनको गुलकन्द के रस में गोली बना लें । .... शीतल जल में दोनों समय सेवन करने से बहुत जल्दी अर्श (बवासीर) भाग जाता है और अर्श रोग की जड़ जीवन में फिर नहीं होती ।”


- राज वैद्य लक्ष्मण जी शर्मा

नीम्बू :- डॉ० जी०एन० चौहान ने लिखा है कि चार कप अलग-अलग धारोष्ण दूध भर लें । इसमें क्रमशः आधा-आधा नीम्बू निचोड़ कर पीते जाएं । एक सप्ताह के सेवन से हर प्रकार की बवासीर नष्ट हो जाएगी ।
प्याज :- एक कच्चा प्याज नित्य खायें, इससे अति भयंकर रक्‍तार्श भी दूर हो जाता हैः “स जयत्सुल्वण रक्‍त मारूतं च ।”
मूली :- यह बवासीर में बहुत लाभदायक है । मूली का रस मिश्री मिला कर या सूखे मूली-पत्ते का चूर्ण मिश्री के साथ, अथवा मूली के पत्ते का रस गो घृत में या मूली के टुकड़ों को घी में तल कर शक्‍कर केसाथ अर्श में सेवन करें ।
पूज्य स्वामी जगदीश्‍वरानन्द ‘सरस्वती’ ने “घरेलू औषधियां” के अन्तर्गत लिखा है कि “एक सौ ग्राम देशी घी की जलेबी एक घंटा भीगने दें । फिर जलेबी खा कर रस पी जाएं । इस तरह एक सप्ताह सेवन करने से जीवन भर के लिए हर प्रकार की बवासीर ठीक हो जाएगी ।” सूर्य मुखी :- इसके बीजों का चूर्ण ताल मिश्री एवं जल के साथ या इसके पत्ते का शाक दही के साथ सभी प्रकार के बवासीर में उपादेय है ।
शक्‍कर :- सम भाग शक्‍कर और इन्द्र जौ मिला कर कूट कर ढाई तोल दही के साथ रक्‍तार्श में सेवन करें ।
हल्दी :- इसे धीमी आंच पर जला कर भस्म बना लें । उसमें थोड़ा खाने वाला चूना डालकर जल के साथ गोली बनायें । एक डेढ़ सप्ताह तक सेवन करें । अनेक रोगियों के अर्शांकुर इसी अवधि में नष्ट हो गए हैं ।
हींग :- इसके वृक्ष की जड़ की छाल को जल के साथ पीस कर छान लें तथा नित्य प्रातः एक माह तक सेवन करने सभी प्रकार के अर्श-रोग में लाभ होता है ।
अनार :- अनार के बीजों को पीसकर उसमें एक दो माशा कलमी सोड़ा मिला कपड़े से छान कर दो बार रोज एक माह तक खायें । 2. अनार, कचनार एवं आँवला, गुल्लर एवं बाकस के पत्ते का रस निचोड़कर मधु के साथ सेवन करने से रक्‍तस्रावी अर्श नष्ट हो जाता है । 4. खट्टे अनार के छिलके का क्वाथ बनाकर पीने से बवासीर से आने वाला रक्‍तस्राव त्वरित रूक जाता है ।
अदरक :- अदरक या सोंठ गुड़ के साथ लेने से अर्श में लाभ होता है ।
ओल (जिमीकन्द, सूरण) :- यह बवासीर में अतीव लाभदायक है ।
दूध :- बकरी का दूध रक्‍तस्रावी अर्श में लाभदायक है । 2. धारोष्ण गाय के दूध में कागजी नीम्बू का रस डालकर पीने से रक्‍तार्श में लाभ पहुंचता है ।
नारियल :- “रक्‍तास्रावी बवासीर में नारियल की जटा जलाकर पीसकर बूरा मिलाकर दस-दस ग्राम की फंकी पानी केसाथ लें- ऐसा मत डा० गणेश चौहान साहब का है ।”
हरसिंगार :- खूनी बवासीर में इसके बीजों को तिगुनी काली मिर्च लेकर शीतलजल में पीसकर गोलियां बना लें तथा सवेरे-सायं सेवन करें । लाभ होगा ।


अर्श में बाह्य- प्रयोगनार्थ

अखरोट :- इसका तेल रूई में भीगो कर बवासीर पर बांध दें ।
कुचला :- अफीम, कुचला तथा सफेद वच्छ नाग तीनों कीसम भाग मिलाकर लगायें, अर्शांकुर गिर जायेंगे ।
फिटकरी :- इसे पानी में घोलकर खूनी बवासीर में गुदा मार्ग में पिचकारी दें ।
एरण्ड :- एरण्ड का तेल को जलन, टीस एवं वेदना कम करने हेतु अर्शांकुर पर लगाना चाहिए ।
मेंहदी :- इसके पत्तों को शिला पर जल के साथ पीसकर गुदा पर रख लंगोटी बांध लें ।
जटामासी :- जटामासी का तेल अर्शांकुर पर लगायें, लाभ होगा ।
भांग की पत्तियों को पीसकर सेंक कर टिकिया बना लें या भांग को जल में घोंट कर टिकिया बना कर गुदा द्वार पर बांधें ।
मिट्‍टी :- चिकनी मिट्‌टी ठंडे जल में भिगोकर रात्रि में सोते समय गुदाशय पर लेप कर लंगोटी बांध लें, “आंतों में बल लाने, मस्सों को सुखाने तथा खून को बन्द करने के लिए मिट्‌टी का प्रयोग बहुत लाभदायक सिद्ध होता है । इसके लिए डेढ़ किलो मिट्ट्टी ठंडे पानी में लपसी-सी सानकर नाभि के नीचे मूत्रेन्द्रिय तक एक कोख से दूसरी कोख तक फैला लेना चाहिए और आधा किलो मिट्‌टी अपने स्थान पर आधे घंटे तक लगी रहे । यह प्रयोग दिन में दो बार किया जा सकता है- ऐसा मत सुप्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक श्री विठ्‌ठल दास मोदी (गोरखपुर) का है ।”
बर्फ :- बर्फ की गीली पट्टी भी अर्श रोग में हितकर है ।
लौकी :- लौकी के पत्तों को बारीकी से पीस कर लगाने से अर्शांकुर नष्ट हो जाते हैं ।


अर्श-रोग की प्राकृतिक चिकित्सा :-

सृष्टि के अनादि काल से प्रकृति मानव की चिर-सहचारी रही है, अप्राकृतिक पदार्थों के सेवन से ही शरीर रोग ग्रस्त होता है । प्राकृतिक चिकित्सा के अन्तर्गत हर बीमारी का कारण कब्ज होता है । वैसे बवासीर तो स्वयं कोई रोग ही नहीं है -इसका सीधा सम्बन्ध कब्ज से है । बवासीर का लक्षण मिलते ही मिट्टी की पट्टी तीस मिनट के लिए पेडू पर देकर पर्याय क्रम से गर्म-ठंडा सेंक क्रमशः तीन-एक मिनट तीन बार करके रबर के कैथेटर के सहारे नीबू का रस मिला गुनगुने पानी में एनिमा देकर पाखाना के बाद पन्द्रह मिनट के लिए रोगी को गरम-पैर स्नान अर्थात्‌ रोगों को एक कुर्सी पर बैठा कर बाल्टी में जल (बर्दास्त करने योग्य) डाल कर उसका पैर उसमें डालें । बीच-बीच में आवश्यकतानुसार गर्म पानी उस बाल्टी में डालें, इस अवधि में रोगी के सिर पर ठंडा कपड़ा रहे तथा समूचा शरीर कम्बल से ढका रहना चाहिए । “गर्म-पैर स्नान के तुरन्त बाद अर्श रोगी को दस मिनट के लिए काफी ठंडे पानी से या पानी में बर्फ डालकर कटि स्नान करा दें । बस, इतनी ही चिकित्सा के बाद बवासीर की भीष्णावस्था समाप्त हो जाएगी ।”

- डॉ० विश्‍वनाथ पोद्दार एन०डी०

अर्श रोग की स्थायी चिकित्सा के लिए कुछ माह तक नियमित रूप से मिट्टी की पट्टी, एनिमा, कटि स्नान आदि द्वारा पेट साफ करें तथा अर्श निरोधिनी चिकित्सा के अन्तर्गत वर्णित-चोकर समेत आटे की रोटी, हरी सब्जी, बेल, पपीता, अमरूद सभी प्रकार के मौसमी फल आदि खायें । इस संदर्भ में ‘अर्श रोग की भोजन द्वारा चिकित्सा में अंकित प्रकृति-प्रदत्त चीजें भी प्राकृतिक चिकित्सा के ही उपादान हैं ।
कन्धे की कसरत : “कन्धे की किसी नस का गुदा मार्ग से विशेष सम्बन्ध है और उस पर दबाव पडने से अर्श रोग दब जाता है । शायद यही कारण है कि मुग्दर हिलाने वालों, कंधे पर बोझा ढोने वाले श्रम जीवियों, बहेंगी, पीनस, पालकी ले जाने वाले कहारों, हल कंधे पर रखकर ले जाने वाले किसानों और मोटा लट्‌ठ कंधे पर रखने वाले देहातियों को प्रायः अर्श रोग नहीं होता ।”


अर्श रोगी को नियमित कुछ न कुछ परिश्रम अवश्य करना चाहिए । नित्य प्रातः एवं संध्या समय झील, तालाब, नदी तट या खुले मैदानों में वायु भ्रमण अवश्य ही करना चाहिए ।
योगासन :- रोग की तीक्ष्णावस्था में वज्रासन करें और बाद में हलासन, धनुर्षासन, सर्वांगासन, मत्स्यासन, उड्‌डीयासन, भुंजगासन आदि के नियमित अभ्यास से अर्श (बवासीर) रोग जड़ से ठीक हो जाते हैं ।


- डॉ० कमल किशोर प्रसाद वर्मा



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