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Today : 19-06-2013 
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संपादकीय जुलाई -2010


प्रिय पाठकगण,

यह जुलाई 2010 का पहला डमी प्रिन्ट प्रकाशन संवाद दर्पण के नाम से आप के समक्ष प्रस्तुत करते हुए हमें बड़ा ही हर्ष हो रहा है । आशा है कि जिस प्रकार से मार्च 2009 से अब तक, आपने हमारी ई पत्रिका समय दर्पण को सराहा व पसन्द किया उससे कहीं ज्यादा आपसे अच्छे सहयोग व सराहना की अपेक्षा है ।

हमारा यह अंक एक राजनैतिक विषय वस्तु पर आधारित है जिसका शीर्षक “अवसर वादी गठबंधन की राजनीति” है । वैसे अपने देश में गठबन्धन का प्रचलन पहली बार 1977 में जब विपक्षी नेताओं ने कांग्रेस (ओ) जन संघ भारतीय लोकदल (बीएलडी०) और सोशलिस्ट पार्टी के एक नई जनता पार्टी में विलय की घोषणा की और 2 फरवरी 1977 को जगजीवन राय एच. एन. बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी ने कांग्रेस से निकलकर कांग्रेस फार डेमोक्रेसी (सी.ए.डी) का गठन किया । जिससे 1977 की लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ और उत्तरी राज्यों में सिर्फ कांग्रेस को २ सीटें मिलीं तभी कांग्रेस फार डेमोक्रेसी पार्टी का जनता पार्टी में विलय होकर गठबन्धन सरकार की राजनीति की परम्परा शुरू की लेकिन तब के नेताओं में फिर भी एक आदर्शवादिता थी जिसके कारण उस समय एक राजनैतिक संकर के विकल्प के रूप में यह कदम उठाया परन्तु वर्तमान के नेताओं में अवसरवादिता है, ये इतने अवसरवादी एवं मौकापरस्त हैं कि ये हर वक्‍त मौके के ताक में रहते हैं मौका देखकर गठबन्धन करना, मौका देखकर पार्टी बदलना आदि इनके लिए आम बात है । इसका ताजा उदाहरण बिहार की राजनीति में वर्तमान में देखने को मिली । जेडयू० प्रमुख नीतीश एवं गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का आपसी विवाद भी अवसरवादी राजनीति का सूचक है लम्बे समय से केन्द्र में राज्य में भाजपा व जेडयू की अचानक मत भिन्‍नता की वजह वर्तमान में बिहार की राजनैतिक स्थिति है, क्योंकि बिहार में नीतिश सरकार काफी लोकप्रिय सरकार साबित हुई परन्तु भाजपा गठबंधन से उसके मुस्लिम वोट कटते नजर आ रहे हैं और मुस्लिमों की नजर में मोदी सबसे कट्‍टर हिन्दू नेता हैं इस कारण नितीश ने आगामी बिहार चुनाव को देखते हुए यह विवाद जनता के समक्ष उत्पन्‍न किया है और चुनाव बाद आवश्यकता अनुसार दोनो फिर मिल भी जाएंगे । ऐसे ही आप बसपा और सपा को ले लीजिए जो वर्तमान में एक दूसरे के बयान विरोधी हैं लेकिन एक समय था जब दोनों ने आपसी गठबंधन सरकार बनायी और जब देखा कि यू०पी० में इससे वोटों का लाभ नहीं मिलना है और कुर्सी लाभ से लेकर विवाद किया और इस स्तर तक विवाद किया कि विधान सभा सदन में ही मायावती एवं मुलायम के बीच अभद्र संवाद एवं विवाद देखने को मिले । सपा एवं बसपा ने १९९३ में गठबंधन द्वारा सरकार बनाया और तय किया कि पहले वर्ष सपा की अध्यक्षता में सरकार होगी उसके बार दूसरी पारी में बसपा की अध्यक्षता में सरकार होगी और यह अवसरवादी गठबन्धन18 अक्टूबर 1995 को टूट गया । ऐसा ही यूपी में एकबार 21 फरवरी को नेताओं के लालच और अवसरवादी गठबन्धन की राजनीति देखने को मिली जिसमें बी०जे०पी की सरकार को मिटाने के लिए कांग्रेस के कई लोग अलग होकर तथा अन्य कई पार्टी के कई नेता टूट कर जगदंबिका पाल को समर्थन कर मुख्यमंत्री की शपथ दिला दिया । जिसका जगदम्बिका पाल बहुमत सिद्ध नहीं कर पाए । अतः अन्त में हम यह कहना चाहेंगे कि आवश्यकता है कि जनता की इन राजनीतिज्ञों के अवसरवादी राजनीति को समझने की ताकि ये हर बार अपने फायदे के लिए जनता का भावनात्मक शोषण ना कर सके । अच्छा होगा कि जनता इनके बहकावे में ना आकर, धर्म, जाति, मजहब से परे अपने क्षेत्र में विकासशील या विकासपुरूष व नेताओं को वोट देवें, जिससे देश का विकास हो ।

- साभार विवेकानन्द साहित्य



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