परम्परा और प्रगतिशीलता
- अर्जुननारायण चौधरी
परम्परा से तात्पर्य है, पूर्वकाल से चली आती हुई रूढ़िगत रीतियों की श्रृँखला और प्रगति का यथार्थ है- ‘प्रकृष्ट रूपेण गतिः इति प्रगति ।’ अर्थात् उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) रूप से सुस्पष्ट व्यापक कल्याणकारी लक्ष्य की ओर जाने वाली गति । इसलिये सभी तरह की गतिशीलता प्रगतिशीलता नहीं है । प्रगतिशीलता में स्पष्ट रूप से लक्ष्य की व्यापकता और सबके कल्याण की भावना का रहना अनिवार्य है । इसके अभाव में गति केवल स्थान या स्थिति परिवर्तन करने वाली साधारण गति या पतन की ओर जाने वाली अधोगति ही कहलायेगी । अतीत काल के पुराने नियमों-रीतियों के बोझ के तले अधिकांश परम्परा इतनी दबी रहती है, जो वर्तमान की बदली हुई परिस्थितियों में मानव-समाज के सर्वात्मक कल्याण को वहन करने में असमर्थ हो जाती हैं । इसके फलस्वरूप ही बदले हुए देश, काल और पात्रों की नवीन स्थितियों में नव-नव सुख-सुविधाओं को प्राप्त करने के लिये पुरानी परम्पराओं का पालन करना विकासोन्मुख मनुष्यों को कष्टदायक लगता है और वे ऐसी परम्पराओं के प्रति उपेक्षा तथा तिरस्कार का भाव रखते हैं । फलतः सामूहिक तल पर एक धारणा पनपती है कि पुरानी परम्परा डबरा-तलाब के जमे हुए प्रदूषित पानी की तरह होती हैं, जहाँ कदई, सेवार, गन्दगी और रोगों के अनेक कीटाणु उत्पन्न हो जाते हैं । इस अवधारणा के परिपुष्ट होने पर समाज के विवेकशील लोग अपने वर्तमान के देशकाल और सामूहिक चिन्तना के विकसित स्तर के अनुरूप उपयोगी नये नियम रिवाज और नयी मर्यादा का सृजन करके अपनी प्रगतिशीलता का परिचय देते हैं और इस कहावत की सम्पुष्टि कर देते हैं,
“बहता पानी निर्मला, रूके सो गन्दा होय ।
प्राणवन्त गति जीव के, रूके सो मुर्दा होय ।”
प्रकृति का स्वभाव ही है सतत् गतिशील रहना । इसलिये प्रकृतिप्रदत्त ब्रह्माण्ड के सभी जड़-चेतन, आणुविक कण से लेकर सूर्य, या नीहारिका तक और सूक्ष्मतम जीवाणु से लेकर महामानव भी अपनी शारीरिक संरचना के साथ मानसिक प्रतिभा के प्रबुद्ध चेतनाकाश तक सदैव प्रगतिशील बने रहते हैं । गत्यात्मकता प्रकृति का ही धर्म है । अतः इस प्राकृतिक स्वभावधर्म गतिशीलता के विरोध में जड़ता को वरण करना या यथा स्थिति को पकड़े रहने का अर्थ ही होता है अपने अस्तित्व की समाप्ति को आमंत्रित करना । विपरीत धारा में अतीत की ओर मुड़ने या यथा स्थिति को जकड़ कर पकड़े रहने के कारण बड़ी-सी-बड़ी प्राचीन सभ्यतायें और बड़े-से-बड़े राष्ट्र काल के गाल में समा गये । विश्व विकास का इतिहास इसका साक्षी है ।
अशिक्षा या कुशिक्षा के कारण ही अनेक पोंगा-पंथी, परम्परावादी लोग रूढ़िगत अवधारणा और मूढ़ मान्यता के वशीभूत होकर प्रकृति के इस गतिशीलता रूपी धर्म को नहीं समझते हैं । ऐसे लोग अपने अज्ञान संजात अन्धविश्वास और घनीभूत अहंकार के कारण आँखें मूदंकर प्रगतिशीलता के पथ पर एक जुट होकर अवरोध बन जाते हैं । जीवन के हर क्षेत्र में सुधारवादी योजना या प्रगतिशीलता के हर कदम इन्हें कभी सुहाते नहीं हैं । समाज के चिन्तनशील सुधारवादियों या महानतम मूलभूत प्रगतिवादियों के लिये भी इन लोगों को समझना कठिन हो जाता है कि संशोधन या प्रगति के पथ पर चलकर ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को चैतन्यमयी आत्मा की ओर प्रवाहित करके अधिक से अधिक उदारता और विचार की व्यापकता से अंलकृत कर लेते हैं । ऐसे ही उदार और वैचारिक धरातल के व्यापक व्यक्तिव वाले लोग ही समाज में सबों के लिये समृद्धि, सुख-सुविधा और शान्ति लाने में सक्षम होते हैं, जिसका प्रमुख श्रेय केवल उनकी प्रगतिशील विचारधारा और उनके प्रेमाप्लावित आचरण को प्राप्त होता है ।
‘विकासवाद के सिद्धांत’ के साथ-साथ जब हम मानवीय सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्म के उन्नयन के इतिहास का विश्लेषण करते हैं तो हमें युक्ति संगत सैकड़ों प्रमाण मिलते हैं कि हर क्षेत्र में पारस्परिक प्रतिद्वन्द्वता के मध्य विवेक संगत संग्राम ही विजय प्राप्त करता है और संग्राम ही समुचित विकास का एकमात्र मूलमंत्र बन जाता है । कपटी, दुराचार, अथवा निकम्मा, निष्क्रिय और कोरा नियतिवादियों के ऊपर सदैव सक्रिय, परम आस्थावान पुरूषार्थियों ने ही विजय प्राप्त किया है । अन्ततः “सत्यमेव जयते” सिद्ध हुआ है । कट्टर पुरान-पंथी, परम्परावादियों के झुण्ड में एक संदेश संचारित किया जा सकता हैः-
“लीक-लीक गाड़ी चले, कुत्ता और कपूत ।
लीक छोड़ तीन चले शायर, सिंह, सपूत ।”
अरस्तू आधुनिक आतंकवाद, हिंसक नक्सलवाद, जड़वादी सुखवाद और पूँजीवादी भीषण शोषणतन्त्र की परम्परा के विरूद्ध प्रगतिशीलता का शंखनाद करना होगा । मानवसमाज में सुख-समृद्धि और शान्ति की कामना रखने वाले मनुष्यों को हानिकारक सभी परम्पराओं की श्रृंखला तोड़कर एक आदर्शोन्मुखी सार्वभौमिक दर्शन में आस्थावान होकर सच्ची प्रगतिशीलता के लिये संग्राम को अंगीकार करना होगा और वृहत के उद्देश्य से अविराम गति से संग्राम में क्रियाशील रहना होगा । यहाँ यह भी स्मरण रखना है कि हर परिवर्त्तन या आधुनिकता प्रगतिशीलता का पर्यायवाची शब्द या समान अर्थी भाव रूप नहीं होता है । अधिकतम आधुनिकता तो अधोगामिता के वाहक ही होते हैं । युवा पीढ़ी में व्याप्त अर्धनग्नता, अनैतिक दिनचर्या, विवाह विहीन सहनिवास और यौन स्वेच्छाचारिता इसके उदाहरण हैं ।
इक्कीसवीं सदी के मानवसमाज का यह सौभाग्य है कि एक सर्वांगीण शोषणविहीन समाजव्यवस्था की स्थापना के लिये प्रउत (प्रगतिशील उपयोग तत्व) एक सर्वोच्च दर्शन और सिद्धांत के रूप में उपलब्ध है । विश्वभर के लाखों नैतिक वादियों ने प्रबल उत्साह से इस अध्यात्मोन्मुखी, नैतिक मर्यादा से मण्डित ‘प्रउत’ को धरती पर क्रियान्वित करने के लिये “करो और मरो” का संकल्प लिया है । पृथ्वी के करोड़ों पीड़ित लोग आशाभरी निगाहों से उनकी राह देख रहे हैं । क्या इस संवास भरे संक्रमणकाल में हम निष्क्रिय मूक दर्शक बने रहेंगे ?
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