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Today : 07-02-2012 
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सरस्वती वंदना


मातेश्‍वरी सरस्वति चरणों में तेरे करूँ नमन
अभिज्ञान के प्रकाश से अज्ञान का तू कर दमन


अवगुण भरे आँचल को मेरे
मोह के ताने-बाने घेरे
मन के निश्‍छल चिर गगन में
पाप के बादल घनेरे


स्वीकार लूँ हर भूल को
मैं लोभ का कर दूँ हवन


रहता नहीं अब योग में
मन लिप्त है हर भोग में
वस में नहीं अब इन्द्रियाँ
तन मन ग्रसित हर रोग में ।


निष्पाप कर हर आत्मा-
है वासना का धुँआ गहन-


दुनिया के मायाजाल में
कलियुग के ऐसे काल में
है झूठ का ही भरम यहाँ
सच्चाई की है चमक कहाँ


है भटक रहा मानव यहाँ
माँ रोक ले तू ये पतन
मातेश्‍वरी सरस्वती चरणों में तेरे करूँ नमन-


- ज्योति ‘किरण’ सिन्हा


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