(मुख्य सड़क से पास ही एक साधारण मकान में थाना अवस्थित है । एक कोठरी में दीवाल के सहारे कई राइफल रखी हुई है । बगल में गोलियों का बक्सा है । एक सन्तरी पीठ पर अपनी राइफल लादे ड्यूटी अदा कर रहा है । बरामदा पर दरोगाजी का ऑफिस लगा हुआ है । वे अपनी सीट पर बैठकर इतमीनान से सिगरेट पी रहे हैं । मेज के सामनेवाली कुर्सी पर उनका प्रियपात्र मित्र मुखियाज्व्व बैठे हैं । हाव-भाव से मुखियाजी बहुत बेचैन लगते हैं । बगल में उनका संरक्ष लठैत फेकुआ अपनी लम्बी लाठी के साथ खड़ा है और उनलोगों के लिये बड़ी मस्ती में खैनी-चूना मिल रहा है । बगल में तीन कुर्सियाँ खाली हैं । दरोगाजी सिगरेट का एक गहरा कश लेकर मुँह से हवा में धुआँ का रिंग (गोल छल्ला) बनाते हैं ।
दरोगाजी - मुखियाजी, इतने बेचैन क्यों है?
मुखियाजी - सर, मेरी तो नींद ही गायब हो गई है । मन में एक दहशत बनी रही है ।
दरोगाजी - घबराने से कुछ नहीं होता है ।
मुखियाजी - सो तो ठीक ही कहते हैं, लेकिन जब तक नीलकंठ गिरफ्तार नहीं होता है, मेरी जान संकट में है । मैं चैन की नींद सो नहीं सकता, न चैन से कहीं बैठ सकता हूँ । न जाने नीलकंठ किस समय तूफान की तरह आ जाय और मेरा प्राण-प्रखेरू लेकर उड़ जाय ।
दरोगाजी - यह सब आपके मन का भ्रम है । उस छोकड़े की यह हिम्मत नहीं हो सकती कि मेरे रहते आप पर आक्रमण करे । हम बहुत जल्दी उसको गिरफ्तार कर लेंगे । सुना है,, निकट के किसी जंगल में छिपकर रहता है ।
मुखियाजी - यह तो सत्य है । किसी जंगल में रहता है । गाँव नहीं आता है, लेकिन शहर में उसका आवागमन है । कई लोगों ने उसे देखा है ।
दरोगाजी - अच्छा ! तब बच्चू कब तक उड़ते रहेंगे? मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लूँ, लेकिन आप चौकस रहें ।
(फेकुआ चुटकी से पकड़कर खैनी उनकी ओर बढ़ाकर खुश हो जाता है । दारोगाजी उसके हाथ से लेकर खुद अपनी बाँयीं तलहथी में रखकर दाहिने अंगूठा से मलते हैं । फिर दो-तीन ताली मारकर उसकी गर्दी झाड़ते हैं और ओठ के नीचे रखते है । फेकुआ शेष खैनी में से एक चुटकी मुखियाजी को देकर बचा-खुचा भाग खुद खा लेता है एवं अपनी लाठी पकड़कर शान के साथ तनकर खड़ा हो जाता है ।)
दरोगाजी - मुखियाजी, मेरी राय है, अपने आदमियों को आप जहाँ-जहाँ तैनात कर दें । जहाँ नीलकंठ दिखाई पड़े, धर दबोचे । फिर तो साले को मैं देख लूँगा ।
मुखियाजी - जी सर । एक आग्रह है ।
दरोगाजी - क्या?
मुखियाजी - आज रात का खाना आप मेरे यहाँ लेने का कष्ट करें ।
दरोगाजी - क्यों? कोई विशेष आयोजन है क्या?
मुखियाजी - नहीं सर, ऐसा कुछ नहीं है । आप के साथ खाने का मन करता है । विशेष तौर पर मुर्ग-मोसल्लम और स्पेशल पुलाव बनाने की बात है ।
दरोगाजी - केवल मुर्ग-मोसल्लम, पुलाव कि और कुछ?
मुखियाजी - (हँसते हुए बैग से निकाल कर शराब की बोतल मेज पर रखते हैं ।)- वह भी है, सर । मिलीट्री कैन्टीन से स्पेशल मँगा लिया है ।
दरोगाजी - (बोतल को हाथ में लेकर लेबुल पढ़ते हुए खुश होकर)- Nice Very good दस बजे रात में अपनी गाड़ी भेज देंगे, मैं पहुँच जाऊँगा । (मुखियाजी शराब की बोतल को बैग में रख लेते हैं और सिगरेट केस से एक सिगरेट दरोगा को देते हैं, जिसे वे लाइटर से जलाते हैं । मुखियाजी घर जाने के लिये कुर्सी से उठते हैं, किन्तु दरोगाजी रोक लेते हैं ।)
मुखियाजी - अब यहाँ रुकने का प्रयोजन ही क्या है?
दरोगाजी - अरे, बैठिये चाय पीकर जाइये ।
(संकेत पाकर फेकुआ चाय लाने जाता है । मुखियाजी पुनः बैठ जाते हैं । थाना में लटके हुए घंटे पर आठ बजने की सूचना में संतरी आठ बार चोट मरता है..... टन.... टन... टन..... टन.... टन.... टन... टन...टन. ऽऽऽ । माधव का प्रवेश । सामान्य शिष्टाचारवश दोनों हाथ जोड़कर दरोगाजी का अभिवादन करते हैं ।)
माधव - सर, मेरा नाम माधव है, इसी शहर का रहनेवाला हूँ । दस दिन हुये मेरी पत्नी घर से लापता हो गयी है ।
दरोगाजी - (क्रोध से) दस दिन हो गये?....तो आज क्यों आये हैं?
माधव - सर, अभी तक अपने रिश्तेदारों के यहाँ हमलोग ढूँढ़ रहे थे । कहीं भी अता-पता नही चला तो आपके पास आया हूँ ।
दरोगाजी - (व्यंग्य से) कहीं पता नहीं चला तो मेरे पास आ गये, दोनों हाथ डुलाते हुए । वह मेरी पाकेट में है । हुजूर के सामने पेश कर दूँ?
माधव - (सकपका जाता है और मुँह नीचे कर लेता है ।) जी........ जी....... मैं... मैं,.....!
दरोगाजी - मेंमें... क्या करता है?
मुखियाजी - थाना आने का कुछ कायदा-दस्तूर होता है ।
माधव - जी.. जी... जानता हूँ.... (जेब से सौ-सौ के दस नोट निकाल कर दरोगाजी के हाथ में देते हुए) - इसे रख लिया जाय, हम सेवा में लगे रहेंगे ।
( दरोगाजी झटके अन्दर की जेब में उनको रख लेते हैं ।)
दरोगाजी - (एक खाली किर्सी की ओर संकेत करते हुए बड़ी आत्मीयता और मधुर स्वर में)- बैठिये ! बैठिये ! आप खड़े क्यों हैं?
(माधव एक कुर्सी को खींच कर खुश होते हुए बैठ जाता है दरोगाजी उससे प्रशनोत्तर करते हैं और एक सादा कागज के पन्ने पर अंकित हैं ।)
दरोगाजी - आपकी पत्नी का नाम क्या है?
माधव - मंजुला ।
दरोगाजी - उम्र?
माधव - 18 वर्ष ।
दरोगाजी - रंग?
माधव - गोरी ।
दरोगाजी - कद?
माधव - पाँ फीट, चार इंच । सुडौल देह ।
दरोगाजी - कैसा कपड़ा पहन रखी थी?
माधव - हरे रंग की सिल्क साडी, उसी रंग की ब्लाउज । गला में सोने का चेन । कान में सोने की इयरिंग ।
दरोगाजी - परिवार के किसी सदस्य से उसको झगड़ा-तकरार हुई थी?
माधव - जी नहीं सर । उसके प्रति परिवार के सभी सदस्यों का व्यवहार बहुत अच्छा है । मैं तो प्राण से भी अधिक उसको प्यार करता हूँ । जब से वह गुम हुई है, गम के मारे मेरा खाना-पीना हराम हो गया है ।
दरोगाजी - आपको किसी व्यक्ति पर सन्देह है, जो उसको बहका कर ले गया हो ।
माधव - ऐसा सन्देह मुझे किसी पर नहीं है ।
दरोगाजी - क्या आपकी तरह वह भी आपको प्यार करती थी ?
माधव - सर, मुझे लगता तो ऐसा ही था, लेकिन वह बहुत तेज-तर्रार युवती है । आजकल की युवतियों का आदि-अन्त समझ पाना बहुत कठिन है ।
मुखियाजी - हाँ सर । यह बात तो ठीक ही कहते हैं । “त्रिया चरित्रं पुरूषस्य भाग्यं दैवो न जानाति कुतो मनुष्यः ।”
दरोगाजी - हूँ... । अच्छा । अपनी पत्नी का कोई फोटोग्राफ आप दे सकते हैं?
माधव - जी सर । (जेब से निकल कर मंजुला का एक फोटोग्राफ उनके हाथ में देता है । दरोगाजी और मुखियाजी बड़े गौर से उस फोटो को देखते हैं । मुँह पर नकाब लगाये कुछ सशस्त्र आतंकवादी युवकों का अचानक प्रवेश, जो तत्क्षण पिस्टल की गोली से संतरी की छाती छलनी कर देते हैं । एक बम दरोगा जी की मेज पर फटता है और दनादन इधर-उधर बमों का प्रहार होने लगता है । धमाका पर धमाका । अंधेरा छा जाता है । भगदड़ मचती है । चीख सुनाई पड़ती है । बम लगने से माधव का शरीर क्षत-विक्षत हो जाता है, फलतः उसका वहीं प्राणान्त हो जाता है । कुछ नकाबपोश घायल दरोगा के और मुखिया के मुँह पर झट से टेप साट देते हैं और दोनों को बाहर में खड़ी अपनी कार में टाँग कर लाद लेते हैं और नौ दो ग्यारह हो जाते हैं । बड़ी फुर्ती के साथ शेष आतंकी थाना में रखे सारे अस्त्र-शस्त्र और राइफल गोली समेट लेते हैं तथा प्रतीक्षा में खड़ी अपनी दूसरी कार में रखकर भाग जाते हैं । कुछ क्षण के बाद ही बाजार फेकुआ, थाना के जमादार और सिपाही केटली में चाय लेकर प्रवेश करते हैं । थाना का दृश्य देखकर भयभीत हो जाते हैं । खतरे की सीटी बजाते हैं ।)
- अर्जुन नारायण चौधरी