एक और बिरासत पराया होते-होते बचा
आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में पांचवी शताब्दी से हृदय रोग के इलाज के लिए भारतीय फूल कमल का इस्तेमाल होता आया है जिसे अब वर्तमान में कोरिया की बहुराष्ट्रीय फार्मा कंपनी मैमर्स पुरीमेड लिमिटेड ने हृदय रोग की दवा बनाकर, यूरोप में पेटेंट दाखिल किया था पर भारत की ट्रडिशनल नालेज लाइब्रेरी ने पुरीमेड के इस प्रयास को विफल कर दिया ।
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को देश में भले ही तवज्जू ना मिली हो परन्तु बहुराष्ट्रीय कंपनियां इनके आधार पर एलौपैथिक दवाएं बना रही है । आयुर्वेद के सिद्धांत इतने मजबूत और प्राकृतिक है कि इसकी वजूद एवं आवश्यकता मानवजीवन में हमेशा बनी रहेगी इसके पीछे मुख्य वजह है कि आयुर्वेद मानव शरीर के स्वभाव पर इसका इलाज करती है । आयुर्वेद का मूल आधार शरीर में कफ, पित्त एवं वाता संतुलनात्मक आधार ही उसके मजबूत वजूद का आधार है ।
ट्रडिशनल नालेज
ट्रडिशनल नालेज लाइब्रेरी (टीकेडीएल) के डायरेक्टर वी. के. गुप्ता के अनुसार मैमर्स पुरीमेड लि. ने कमल के औषधीय तत्वों से इस्केमिक हार्ट अटैक की दवा तैयार की और पेटेंट के लिए यूरोपीय पेटेंट आफिस में आवेदन किया । टीकेडीएल और यूरोपीय पेटेंट आफिस के बीच पहले ही समझौता हो चुका है । जैसे ही हमें इसकी खबर लगी हमने पूरे तथ्य यूरोपीय पेटेंट आफिस के समक्ष रखे । उन्हें बताया कि आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र की पुस्तकों रसयोग सागर, भेला समाहिता, सुश्रुत समाहिता एवं वंगसेना में कमल के औषधीय तत्वों से दिल की बीमारियों का उपचार का ब्यौरा है । भारत की तरफ से सवाल उठाया गया कि उपचार की जो विधि भारत में पांचवी सदी से ही प्रचलित है, उस पर आज कोई कंपनी कैसे पेटेंट ले सकती है । डा. गुप्ता के अनुसार यूरोपीय पेटेंट आफिस ने उन्हें सूचित किया है कि भारत द्वारा पेश तथ्यों के आधार पर पुरीमेड पेटेंट आवेदन ईपी- १७८१३०९ खारिज कर दिया है । इस बीच अपुष्ट सूत्रों से खबर मिली थी कि उपरोक्त कंपनी ने अरबों रूपये निवेश कर उक्त दवा को बनाना भी शुरू कर दिया था । दरअसल, पेटेंट फाइल करते ही दवा पर संबंधित कंपनी का अधिकार मान लिया जाता है । लेकिन पेटेंट खारिज हो जाने के बाद, अब कंपनी के सारे दावे खारिज हो गए हैं । इससे पहले टीकेडीएल से खरबूजे के छिलके, अश्वगंधा, अर्जुन, चाय की पत्तियों, ब्राह्मी, हल्दी, बंगाली चने, नीम, अलोवेरा, पुदीना तथा कलामेघा के औषधीय तत्वों से बनी दवाओं के पेटेंट यूरोपीय और अमेरिकी पेटेंट आफिसों से खारिज कराए हैं । टीकेडीएल के अफसरों का मानना है कि विदेशी पेटेंट कार्यालयों द्वारा भारतीय औषधीयों पर करीब २००० पेटेंट हर साल दिए जा रहे हैं ।
- मदन जैड़ा