Untitled Page
Today : 18-05-2012 
samay darpan Narmada Creative Pvt. Ltd.

आन्तरिक रूप सरल राजनयिक शैली वाला भारत की
विश्‍वसनीयता और प्रभाव अंतर्राष्ट्रीय
परिदृश्य में बढ़ रहा है ।


जबसे भारत के साथ अमेरिकी परमाणु करार हुआ है और उसे अंतर्राष्ट्रीय परमाणु बिरादरी की मान्यता मिली है, कई देश भारत के साथ करार करने को आगे आए हैं । इसकी वजह यह है कि भारत एक बड़ी आर्थिक ताकत की तरह उभर रहा है और परमाणु ऊर्जा को लेकर भारत का रिकार्ड बेदाग है, इसलिए तमाम लोकतांत्रिक देशों को परमाणु करार करने में ऐसी कोई दिक्‍कत या विवाद का डर नहीं है कि उसके दिए परमाणु संयंत्रों या सामग्री का दुरूपयोग होगा । फिलहाल स्थिति थोड़ी गड़बड़ इसलिए है कि चीन ने पाकिस्तान को दो परमाणु संयंत्र देने का समझौता किया है और सारी अंतर्रराष्ट्रीय बिरादरी में उसका विरोध हो रहा है । दिक्‍कत यह है कि जिसके विरोध से कुछ फायदा हो सकता है, वह अमेरिका है और अमेरिका ने इस मुद्दे पर कोई कड़ा रूख नहीं अपनाया क्योंकि उसे ईरान पर पाबंदियां लगाने के मामले में चीन का समर्थन चाहिए था । अमेरिका ने संयुक्‍त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मतदान के बाद ही इस बात का विरोध किया लेकिन उस विरोध में कोई दम नहीं था । लेकिन परमाणु बिरादरी के कई देश, खासतौर पर यूरोप के देश या जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देश इस करार के विरोध में खड़े हो गए हैं जो कि स्वाभाविक भी है क्योंकि दुनिया में पिछले वर्षो में परमाणु मामले में जहां भी खतरनाक और गोलमाल काम हुए हैं, उनके सूत्र चीन और पाकिस्तान से ही जुड़े हैं । ये दोनों देश परमाणु खतरे को कम कराने की अंतर्राष्ट्रीय कोशिशों को लगातार विफल बनाते रहे हैं । भारत ने भी चीन-पाकिस्तान समझौते का विरोध किया है लेकिन यह डर भी था कि इस खतरे की छाया भारत के परमाणु कार्यक्रम पर न पड़े । भारत को स्वीकार्यता मिले ज्यादा वक्‍त नहीं हुआ है इसलिए सख्ती बरतते हुए ये देश भारत के साथ उदारता को भी खारिज कर सकते थे । भारत-कनाडा परमाणु समझौता यह बताता है कि भारत की विश्‍वसनीयता और अप्रसार के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को कनाडा जैसा देश भी स्वीकार करता है ।

जी-20 सम्मेलन के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह की अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात भी महत्वपूर्ण है । डॉ. मनमोहन सिंह देश में भले ही बिना किसी प्रचार के चुपचाप काम करने वाले प्रधानमंत्री हैं । अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वे महत्वपूर्ण राजनयिक की तरह उभरे हैं । ओबामा ने अगर यह कहा कि जब मनमोहन सिंह बोलते हैं तो सारी दुनिया सुनती है, तो यह सिर्फ औपचारिक प्रशंसा नहीं है । मंदी से उबरने के उपायों पर भारतीय प्रधानमंत्री की राय का इस सम्मेलन में बड़ा महत्व था और राहत पैकेज अभी न हटाने के उनके तर्कों ने जी-20 की नीति को प्रभावित किया । अमेरिका भी यह चाहता है कि अभी राहत तेजी से कम न की जाए । राष्ट्रपति ओबामा की भारत यात्रा में कुछ महीने बचे हैं और भारतीय उपमहाद्वीप की राजनीति में इस यात्रा से बड़े परिवर्तन हो सकते हैं । भारत की राजनयिक शैली बहुत आक्रामक और मुखर नहीं है, लेकिन प्रभावशाली है ।

- एजेन्सी



| More
About us | Advertisement | Contact us | Privacy Policy | Feedback | Admin