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Today : 18-05-2012 
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लूट सको सो लूट, आजादी की छूट

- भरत मिश्र प्राची
आज देश को स्वतंत्र हुए 63 वर्ष होने जा रहे है, पर आजादी के कहीं से लक्षण नहीं दिख रहे हैं । वहीं तोड़-फोड़, लूट- खसोट, जो आजादी से पूर्व विद्यमान था । विरोध जताने की परिपाटी में कही नयापन नजर नहीं आ रहा है । संसद से लेकर विधान सभा आज दंगल के आखाड़ा बन चुके है । जहां वैचारिक मंथन की जगह बाहुबल का प्रयोग ज्यादा देखा जा सकता है । देश अपना है, इसका आभास आज तक किसी में हो पाया हो, ऐसा कहीं नजर नहीं आ रहा है । आज भी विरोध प्रदर्शन में सबसे ज्यादा सरकारी सम्पत्ति, पब्लिक प्रोप्रटी का ही नुकसान होते देखा गया है । न्यायालयों में न्याय पाने के लिये पूर्व की भांति आज भी भटकते देखा जा सकता है । सरकारी कोई महकमा नहीं है, जहां भ्रष्टाचार नहीं व्याप्त हो । सत्ता पाने के लिए बुथ कैपचरिंग, सांसद, विधायक की खरीद-फरोक्‍त, आज आम बात हो गई है । संविधान की रक्षा हेतु शपथ लेने वाले जनप्रतिनिधि ही संविधान की धज्जियां उड़ाने में लगे हुये है । देश के हालात जो सामने है, वह किसी से अनभिज्ञ नहीं है । जिसकी सुरक्षा, अस्मिता, दिन पर दिन खतरे में पड़ती जा रही है । कोई संसद पर हमला बोल रहा है, तो कोई हमलावर को बचाने की कोशिश कर रहा है । यहां हर स्वरूप विदेशी सा दिखाई देने लगा है । ‘लूट सको सो लूट’ का जीवन्त प्रकरण आजादी के उपरान्त ज्यादा सक्रिय हो चला है । देश में अपहरण, भ्रष्टाचार, बलात्कार, अनैतिकता के अनेक कदम दिन प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं । आतंकवाद से देश को चुनौतियआं मिलने लगी हैं । देश के विकास स्तम्भ सरकारी, अर्द्धसरकारी संस्थायें सफेद हाथी बन चुके हैं । जो जहां है, वहीं अपने-अपने तरीके से देश को लूट रहा है । आजादी से पूर्व इस देश को विदेशियों ने लूटा, आजादी के बाद देश वाले लूट रहे हैं । फिर देशी-विदेशी, आजादी-गुलामी की परिभाषा इस संदर्भ में किस तरह परिभाषित हो पायेगी, यह विचार किया जाना चाहिए । जहां इस तरह के जनप्रतिनिधियों की संख्या लोकतंत्र में बढ़ती जा रही है । जहां आज आम जनता पर विभिन्‍न तरह के टैक्सों के बोझ का दायरा बढ़ता जा रहा है । सुरसा की तरह बढ़ती जा रही महंगाई अनियंत्रित होती जा रही है वही अनेक लोग राजनीतिक छांव में अवैध रूप से धन बटोरने एवं राजनीतिज्ञों को सुख सुविधा के तमाम संसाधन जुटाने में तत्पर हैं । देश का सर्वोच्च पद पर भी स्वार्थ से प्रेरित होकर आज अनैतिक राजनीति का शिकार बन चुका है । लोकतंत्र के इस सर्वोच्च पद पर भी राजनीतिक शिकंजा कसता नजर आ रहा है । हत्या, अपहरण, अवैध गतिविधियों में लिप्त आज लोकतंत्र का सम्मानित सांसद, विधायक है । जेल में बंद है, फिर भी सांसद है । जो जंगल में घूम रहे हैं, वे संसद में दिख रहे हैं । आखिर आजादी के बाद उभरे इस तरह के परिदृश्य के लिये कौन जिम्मेवार है?

आजादी उपरान्त संविधान जो बना उसमें आरक्षण संबंधित विधेयक प्रमुख रहा । आरक्षण के स्वरूप एवं उद्देश्य पर एक नजर डालें, जब देश स्वाधीन हुआ, संविधान में आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग को ऊपर उठाने की दृष्टि से सहायतार्थ विशेष सुविधाओं का एक पैकेज आरक्षण पद्धति के तहत दिये जाने का देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने वैचारिक रूप से निर्णय लिया तथा संविधान में शामिल कर इसे अमल में भी लाये जाने का भरपूर प्रयास किया गया । जिसके परिणाम शुरू-शुरू में बेहतर ही निकले । समय के अनुसार ऐसा होना भी मुनासिब था । सामाजिक एवं आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग को राहत भी मिली । उनका जीने का नजरिया बदला परन्तु धीरे-धीरे यह जी का जंजाल भी बनता गया । इस राहत के नाम देश जातिगत राजनीति में धीरे-धीरे बढता चला गया । पहले आदिवासी अनुसूचित एवं बाद में पिछड़े वर्ग के नाम पर देश में फिर से आरक्षण के तहत वोट की राजनीति शुरू हो गई । कुछ वर्षों के लिए लागू यह पद्धति वोट की राजनीति के कारण जन्म-जमांतर ही नहीं हुई बल्कि इसे पाने की एक होड सी हर जातियों में समा गई । लोकतंत्र के पहरूए इसे स्वहित में एक हथियार बनाकर लोकतंत्र पर कब्जा करने का सशक्‍त माध्यम इसे बना लिया । जिसके कारण आज आरक्षण मूल उद्‌देश्य से भटकर कर स्वहित की राजनीति में समा चला है । जहां देश एक बार फिर से जाति के नाम पर बंटने को तैयार दिख रहा है । इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय को भी इस तरह के संदेश आरक्षण के खिलाफ जारी करने पड़े ‘देश को मत बांटो’ ! इस तरह के अनेक सवाल अज हमारे सामने है । आज लोकतंत्र की दुहाई देने वाले ही लोकतंत्र का खुला मजाक उड़ा रहे हैं । जनता द्वारा चुना गया जनप्रतिनिधि अब वेतनभोगी हो चुका है, जो अपनी हर सेवा का सेवा शुल्क लेने लगा है । जन सेवक से मालिक बन चुका है । कल जिसके पास रहने की झोपड़ी नहीं थी, आज उसके पास महल है । अब प्रश्न यह उभरता है, कि क्या इन्हीं हालातों के लिये हमने आजादी पाई ।

देश में लोकतंत्र के इर्द-गिर्द के बदले हालात को देखते हुए हमें आजादी के वास्तविक स्वरूप पर फिर से मंथन करना होगा । क्या इन्हीं हालातों के लिये जहां लूट-खसोट का जीवन्त प्रकरण सर्वाधिक रूप से जागृत हो चला हो, ‘लूट सको से लूट, आजादी की छूट’ हेतु आजादी की लड़ाई लड़ी गई थी? चुनाव व्यापार का रूप ले चुका हो, जहां देश की सेवा का संकल्प लेकर इस क्षेत्र में उतरा जनप्रतिनिधि ज्यादा से ज्यादा धन बटोरने में लगा हुआ हो । इस तरह के हालातों के बीच जहां देश भक्‍ति की भावना हमारे जनप्रतिनिधियों के दिल से निकलती जा रही हो, जहां देश की ऐनकेनप्रकारेण लूटने की प्रवृत्ति ज्यादा पनप रही हो, कैसे देश को संकट से उबारा जा सकता है? आजादी के पावन पर्व पर सभी को विचार करना होगा ।



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