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Today : 18-05-2012 
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स्वाधीनता का अभिप्राय है, “खुद के कर्तव्यों की अधीनता”

--कृष्ण गोपाल मिश्र
15 अगस्त 2010 को हमलोग आजाद भारत का 63वां वर्ष पूर्ण कर 64 वें वर्ष में प्रवेश कर जाएंगे । हर साल यह पावन दिन भारतवासियों के लिए स्वाधीनता दिवस के रूप में मनाया जाता है । स्वाधीनता का अभिप्राय है- स्व-अधीनता अर्थात खुद की अधीनता । खुद की अधीनता का भी दो तरह का मतलब निकलता है- एक वह जो मन के अधीन होकर कार्य करते हैं किन्तु इसे स्वाधीनता के अर्थ में नहीं रखा जा सकता, क्योंकि मन तो चंचल है और मन में कोई अधीनता नहीं होती । लेकिन जब लोग अपने कर्त्तव्यों व अहसासों का एहसास करते हुये स्वा अधीनता महसूस करते हैं वही सही मायने में स्वाधीनता है ।

परन्तु आजादी का यह दिन कहीं ना कहीं मूलभूत रूप से आज के युवाओं में अपना असर या अपना अभिप्राय तनिक भी नहीं छोड़ पा रहा है । सिर्फ औपचारिकता वश आजादी का यह दिन मौज-मस्ती व छुट्‌टी का दिन बनकर रह गया है इतना ही नहीं इन्हें तो इस बात का अभी एहसास नहीं है कि यह आजादी कितने बलिदानों के बाद मिली है । युवाओं को क्या कहें अधिकांशतः देशवासियों के मन में भी आजाद भारत से अभिप्राय यही है कि वे आजाद और उन्मुक्‍त हैं, और अपनी मनमानी कर सकते हैं, परन्तु आजादी दिलाने वाले सैलानियों ने यह सोचकर आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी थी । आज के देशवासियों को यह जरूर समझना चाहिए कि हम स्वाधीन भारतीय खुद के अधीन हैं, जहां से खुद की जिम्मेदारियों, कर्त्तव्यों, देश के प्रति हमारी जिम्मेदारियों के निर्वहन की अधीनता की शुरू होती है । यह अधीनता १५ अगस्त सन्‌ १९४७ से ही शुरू हो गयी थी, लेकिन पराधीनता सिर्फ दूसरों के आदर्शों का पालन करना ही होता है, लेकिन स्वाधीनता खुद के दायित्वों का बोझ रखते हुये उसे मूलरूप देने के लिए राष्ट्रों का निर्माण करना तथा अपने सभी दायित्वों के प्रति सजग रहना आदि है

पर आजादी के बाद आजादी की खुशी में स्वाधीनता के मूलभूत बातों को हम देशवासी अपने जहन में नहीं बिठा सकते । और यही कारण है कि हम उन्मुक्‍त होकर अपनी मनोभूति रूपी इच्छाओं की पूर्ति हेतु आजादी की पूर्ति करते हैं । दिन पर दिन हम देशवासी अपने कर्त्तव्यों और देश के प्रति अपने दायित्वों, अपनी संस्कृति व निष्ठा से दूर तो होते ही जा रहे है, साथ ही साथ अपनी संस्कृति की वाहक मातृभाषा हिन्दी से भी दूर होते जा रहे हैं । जब तक हम स्वाधीनता का मूलभूत अर्थ अपने जहन में नहीं बिठा लेते तब तक दुनिया में हम अपनी सभ्यता, संस्कृति का परचम नहीं लहरा सकते । और ना ही हम अपनी पहचान बना सकते हैं, और ऐसा अगर हम नहीं कर सकते तो उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान जिनके प्राणों की आहुति पर हमें स्वतंत्रता मिली है, उसे हम निरर्थक साबित कर देंगे । और जहां कहीं से भी अगर उनकी अंतरात्मा इस भारत को देख रही है तो भारत की इन स्थितियों को देखकर दुःखी ही होगी । अंत में अपनी इन बातों के साथ ज्योति प्रकाश की मार्मिक कविता प्रस्तुत करना चाहूंगा-

स्वाधीनता का अर्थ है, स्व की अधीनता
परमार्थ प्राप्त कराना न कि दीनता
शहीद अब तो हो ग‌ए गुमनाम हम वतन
अब जश्न की चिंता है श्रद्धांजलि की कम
जिस अंग्रेजियत के लिये बलिदान कर दिया
उसी ने दिलो-दिमाग पर अधिकार कर लिया
संस्कृति अब हो गयी निर्वस्त्र साथियों
हिंदी है अब दम तोड़ती घुटन कातिलों
1947 में जब स्वाधीनता मिली
कुछ वक्‍त ही ये स्वाधीनता रही
चंद कदम बाद आजादी बन गया
अब 15 aug. जस्न-ए-बर्बादी बन गया

मंद पवन को आँधी ना कहो
स्वाधीनता को जस्ने आजादी ना कहो
भाव को समझो वरना अनर्थ ही होगा
स्वाधीनता दिवस मनाना व्यर्थ ही होगा
बेशक तुम अंग्रेजी, चाईनीज, फारसी पढ़ो,
ज्ञान को बढाओ ना कि उसको सीमित करो
पर अपनी सभ्यता, संस्कृति का गला मत घोंटो
प्राणहीन हो रही हिन्दी प्रिये! इसका कत्ल रोको
लो प्रण आज स्वयम्‌ को अपने अधीन कर लो
मन, कर्म, वचन पर जीत कर लो
अधिकार मत छीनो किसी का गला मत घोंटो

जीने दो सबको मनुष्य ! प्राण वायु न रोको
रोग, गरीबी, व भ्रष्टाचार को रोको
बच्चों, औरतों पर हो रहे अत्याचार को रोको
विवशता मनुष्यता विकास, एकता की बात को सोचो
मजदूर, किसान मर रहे हैं इनके आँसू तो पोंछो
जश्न-ए-आजादी मना रहे हो पहलवान
ये जन्मदिन नहीं तुम्हारा, है देश का त्यौहार
तुम्हें क्या कमी है तुम तो ता उम्र हो आज़ाद
पर इस दिन तो कर दो किसी के लिये दो अश्रु का बलिदान

- ज्योति प्रकाश सिंह


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