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Today : 07-02-2012 
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भारत में छुआ-छूत नहीं थी

- डॉ. राजेश कपूर, पारम्परिक चिकित्सक
फ्रांस के शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन को अंजाम दिया । इसके लिए उन्होंने मादक द्रव्यों की लत के शिकार लोगों के दिमाग पर शोध किया और पाया कि लत के कारण उनका दिमाग सामान्य हालात में आ पाने में नाकाबिल हो जाता है । डेली एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के मुताबिक, लंबे समय तक मादक द्रव्यों की लत लोगों के दिमाग के काम करने के तरीके को बदल देती है और अध्ययन में पाया गया कि जब दिमाग वापस सामान्य होने की हालत में आने के काबिल नहीं रह जाता तो व्यक्‍ति लत का शिकार हो जाता है । वैज्ञानिकों से दिमाग में पाये जाने वाला लचीला पदार्थ एलटीडी बनना बंद हो जाता है । एलटीडी नई यादों के विकास में सहायक होता है और इस वजह से लचीले व्यवहार में योगदान देता है । शोध से जुड़े डॉ. पिएर वी. पिआत्जा ने बताया, हमने परिणामों में पाया कि बिना लत वाले लोगों के दिमाग के अध्ययन से ही हम संभवतः लत छुड़ाने के तरीकों का पता लगा सकते हैं ।

पता नहीं भारत में कब और कैसे ये छुआ-छूत का विषधर सांप धुस गया? पूर्वाग्रहों को छोड़ कर ज़रा तथ्यों व प्रमाणों की रोशनी में देखें तो पता चलता है कि भारत में जातियां तो थीं पर छुआ-छूत नहीं, स्वयं अंग्रेजों के द्वारा दिए आंकड़े इसके प्रमाण हैं ।

भारत को कमजोर बनाने की अनेक चालें चलने वाले अंग्रेजों ने आंकड़े जुटाने और हमारी कमजोरी व विशेषताओं को जानने के लिए सर्वे करवाए थे । उन सर्वेक्षणों के तथ्यों और आज के झूठे इतिहास के कथनों में ज़मीन आसमान का अंतर है । सन 1820 में एडम स्मिथ नामक अँगरेज़ ने एक सर्वेक्षण किया । एक सर्वेक्षण टी.बी मैकाले ने करवाया था, इन सर्वेक्षणों से ज्ञात और अनेक तथ्यों के इलावा ये पता चलता है कि तबतक भारत में अस्पृशयता नाम की बीमारी नहीं थी । यह सर्वे बतलाता है कि-

* तब भारत के विद्यालयों में औसतन 26% ऊंची जातियों के विद्यार्थी पढ़ते थे तथा 64% छोटी जातियों के छात्र थे ।
* 1000 शिक्षकों में 200 द्विज/ब्राह्मण और शेष डोम जाति तक के शिक्षक थे । सवर्ण कहलाने वाली जातियों के छात्र भी उनसे बिना किसी भेद-भाव के पढ़ते थे ।
* मद्रास प्रेजीडेन्सी में तब 1500 (ये भी अविश्‍वसनीय है न) मेडिकल कालेज थे जिनमें एम. एस. डिग्री के बराबर शिक्षा दी जाती थी । (आज सारे भारत में इतने मेडिकल कालेज नहीं होंगे ।)
* दक्षिण भारत में 2200 (कमाल है!) इंजीनियरिंग कालेज थे जिनमें एम.ई. स्तर की शिक्षा दी जाती थी । * मेडिकल कालेजों के अधिकांश सर्जन नाई जाति के थे और इंजीनियरिंग कालेज के अधिकांश आचार्य पेरियार जाति के थे । स्मरणीय है कि आज छोटी जाती के समझे जाने वाले इन पेरियार वास्तुकारों ने ही मदुरई आदि दक्षिण भारत के अद्भुत वास्तु वाले मंदिर बनाए हैं ।


* तब के मद्रास के जिला कलेक्टर ए.ओ.ह्यूम (जी हाँ, वही काँग्रेस संस्थापक) ने लिखित आदेश निकालकर पेरियार वास्तुकारों पर रोक लगा दी थी कि वे मंदिर निर्माण नहीं कर सकते । इस आदेश को कानून बना दिया था ।
* ये नाई सर्जन या वैद्य कितने योग्य थे इसका अनुमान एक घटना से हो जाता है । सन्‌ 1781 में कर्नल कूट ने हैदर अली पर आक्रमण किया और उससे हार गया । हैदर अली ने कर्नल कूट को मारने के बजाय उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया । भागते, भटकते कूट बेलगाँव नामक स्थान पर पहुँचा तो एक नाई सर्जन को उसपर दया आगई, उसने कूट की नई नाक कुछ ही दिनों में बना दी । हैरान हुआ कर्नल कूट ब्रिटिश पार्लियामेंट में गया और उसने सबको अपनी नाक दिखा कर बताया कि मेरी कटी नाक किस प्रकार एक भारतीय सर्जन ने बनाई है । नाक कटने का कोई निशान तक नहीं बचा था । उस समय तक दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी की कोई जानकारी नहीं थी । तब इंग्लैंड के चिकित्सक उसी भारतीय सर्जन के पास आये और उससे शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक सर्जरी सीखी । उसके बाद उन अंग्रेजों के द्वारा यूरोप में यह प्लास्टिक सर्जरी पहुंची ।

* अब ज़रा सोचें कि भारत में आज से केवल 174 साल पहले तक तो कोई जातिवाद यानी छुआ-छूत नहीं थी । कार्य विभाजन, कला-कौशल की वृद्धि, समृद्धि के लिए जातियां तो ज़रूर थीं पर जातियों के नाम पर ये घृणा, विद्वेष, अमानवीय व्यवहार नहीं था । फिर ये कुरीति कब और किसके द्वारा और क्यों प्रचलित की गई? हजारों साल में जो नहीं था वह कैसे हो गया? अपने देश समाज की रक्षा व सम्मान के लिए इस पर खोज, शोध करने की ज़रूरत है । यह अमानवीय व्यवहार बंद होना ही चाहिए और इसे प्रचलित करने वालों के चेहरों से नकाब हमें हटाना चाहिए । साथ ही बंद होना चाहिए ये भारत को चुन-चुन कर लांछित करने के, हीनता बोध जगाने के सुनियोजित प्रयास । हमें अपनी कमियों के साथ-साथ गुणों का भी तो स्मरण करते रहना चाहिए जिससे समाज हीन ग्रंथी का शिकार न बन जाये । यही तो करना चाह रहे हैं हमारे चाहने वाले, हमें कमजोर बनाने वाले । उनकी चाल सफल करने में सहयोग करना है या उन्हें विफल बनाना है? ये ध्यान रहे !




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