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Today : 18-05-2012 
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बोये पेड़ बबूल का, आम कहां से होय

- भरत मिश्र प्राची
दिन पर दिन लोकतंत्र का जो विकृत स्वरूप उभर कर सामने आ रहा है, निश्‍चित तौर पर इतिहास के पन्‍नों पर एक काले अध्याय का प्रसंग जोड़ने जा रहा है । देश की बागडोर संभालने वाले लोकतंत्र के रक्षक हमारे जनप्रतिनिधि ही जब सारी मर्यादाओं को पार कर संसद एवं विधान सभा के भीतर उद्दंडता पर उतर आये एवं संविधान की धज्जियां उड़ाने लगे तो इस तरह की विषम परिस्थितियों से देश को आखिर कौन बचाए? अभी हाल ही में बिहार विधान सभा के अन्दर सत्र में बहस के दौरन जो विषम परिस्थितियां उभर कर सामने आ रही हैं, जहां मानवीय सदस्यों द्वारा बातचीत की जगह बाहुबल का खुला प्रयोग किया जा रहा हो, जहां सभा के सर्वोपरि पद पर विराजमान सभापति पर चप्पलें फेंकी जा रही हों, जहां इसे रोकने के लिये मार्सल बुलाना पड़ रहा हो, इस तरह के हालात निश्‍चित तौर पर उद्दंडता की सारी सीमाओं को पार कर चुके नजर आ रहे हैं । इस तरह की पृष्ठभूमि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में पहली बार उभर रही हो, ऐसी बात नहीं, विगत कई वर्षों से इस तरह की घटनायें संसद एवं विधान सभा में लगातार घटती जा रही हैं । इसी तरह की घटना के शिकार उत्तर प्रदेश के तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी हुए जिन्हें अपने बचाव के लिये विधानसभा में मेज के नीचे छिपना पड़ा । संसद में कई बार हाथा-पाई की केवल नौबत ही नहीं आई, मेज, कुर्सियां, माईक तक एक दूसरे पर फेंके गये, गाली-गलौज एवं अश्लील शब्दों की बौछार के साथ-साथ अभद्रता की सारी सीमाएं लांघ दी गईं । इस तरह के परिवेश में कई बार अध्यक्ष की गरिमा को भी ठेस पहुंची । संविधान की कांपियां फाड़ डाली गईं । हालात को काबू करने के लिए मार्सल का प्रयोग बार-बार करना पड़ा । स्वतंत्रता उपरान्त अपने ही देश में देश के सर्वोच्य एवं सम्मानित आंगन में जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधियों द्वारा इस तरह के अभद्र एवं नैतिक आचरण का प्रदर्शन हो, निश्‍चित तौर पर इस तरह की गतिविधियां लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने में मददगार साबित होती हैं । इस तरह के हालात आये दिन देश भर में दिन पर उभरते ही जा रहे हैं, जिससे लोकतंत्र की साख तो गिरती ही जा रही है और देश की गरिमा भी दिन प्रति दिन धूमिल होती जा रही है । इस तरह के हालात के लिये इस परिवेश से जुड़े आज सभी दोषी हैं, कोई किसी से कम नहीं । आज जिन जनप्रतिनिधियों की इस तरह की अलोकतांत्रिक, अप्रासंगिक एवं अशिष्ट आचरण से लोकतंत्र की गरिमा दिन पर दिन धूमिल होती जा रही है उन्हें चुनकर वहां तक पहुंचाने में हम मदद ही नहीं करते बल्कि इस तरह के लोगों का अभिनंदन कर इस तरह के कार्य करने में उनका मनोबल भी बढ़ा रहे हैं । तभी तो इस तरह के अशोभनीय कार्य करते इन्हें कभी लज्जा तक नहीं आती । इस तरह के कार्य को ये अपना पुनीत कर्तव्य भी मानने लगे हैं । लोकतंत्र की धज्जियां उड़े, देश की गरिमा को आंच आये या देश खंडित हो जाय, क्या फर्क पड़ता है? इन्हें तो वही करना है जो आज तक सीखा है, जो इनका मन करता है । इस तरह के परिवेश को प्रश्रय देने वालों को कुछ इसी तरह के संस्कार मिले हैं जिससे अपने आप इन्हें अलग कर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है ।

आखिर इस तरह के हालात कैसे उभरे, इस पर मंथन होना चाहिए । इस दिशा में स्वतंत्रता उपरान्त लोकतंत्र के बदलते हालात पर एक नजर डालें । जब से लोकतंत्र के आंगन में बाहुबलियों का परिवेश शुरू हुआ तब से इसका स्वरूप ही बदल गया । अपनी बात को मनवाने का तौर तरीका बदल गया । विरोध जताने का स्वरूप बदल गया । तर्क संगत परिवेश पर बाहुबल का आधिपत्य दिखाई देने लगा । इस तरह के उभरे हालात में आचार संहिता का उल्लंघन होना स्वाभाविक है । जो कुछ आजकल संसदीय इतिहास में घटित हो रहा है, वह परिवेश के अनुकूल ही हो रहा है । ‘बोये पेड़ बबूल का, आम कहां ते खाय’ वाली कहावत आज लोकतंत्र के बदलते परिवेश को पूर्णरूपेण चरितार्थ कर रही है । जिस तरह के प्रतिनिधि संसद एवं विधान सभा को सुशोभित करेंगे, उसका स्वरूप भी वैसा ही निर्धारित होगा । आज बिहार की विधान सभा में जो कुछ घटित हुआ है, जिसे बार-बार लोकतंत्र का काला अध्याय बताया जा रहा है, वह लोकतंत्र के इतिहास में पहले भी घट चुका है, आज भी घटा है और कल भी घटेगा, जिसे बाहुबलियों के परिवेश में रोक पाना नामुमकिन है । इस तरह के हालात पर केवल मगरमच्छी आंसू बहाने एवं बेतुके सवाल उठा देने से समस्या का न तो ठोस समाधान निकलना है न लोकतंत्र की बिगड़ती काया में कोई बदलाव आना है । यदि इस तरह के परिवेश से निजात पाना है तो लोकतंत्र के पवित्र आंगन को बाहुबलियों एवं आपराधिक प्रवृत्ति से जुड़े लोगों से बचाना होगा । लोकतंत्र के परिवेश को बौद्धिक तर्कसंगत हालात से जोड़ते हुए वैचारिक पृष्ठभूमि को जागृत करना होगा । आज देश में अच्छे एवं वैचारिक लोगों की कमी नहीं है, जरूरत है उन्हें तलाशने एवं लोकतंत्र के आंगन तक पहुंचाने की । इस तरह के परिवेश बनाने में देश के हित को सर्वोपरि रखते हुए सभी को जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रवाद की राजनीति से ऊपर उठकर लोकतंत्र की रक्षा हेतु कार्य करना होगा ।



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