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Today : 07-02-2012 
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रक्षाबंधन : स्वरूप एवं संदर्भ

-प्रतिभा श्रीवास्तव
भारत में पर्व-त्यौहारों का विशेष महत्व है । वर्ष के हर महीने कोई न कोई त्यौहार आता ही रहता है परन्तु श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले रक्षाबंधन का इंतजार खासकर बहनों को बड़ी बेसब्री से रहता है । इस वर्ष यह पर्व 5 अगस्त को मनाया जाएगा । श्रावण में मनाए जाने के कारण इसे सावनी या सलूनो भी कहा जाता है । भारतीय परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्व है । रक्षासूत्र को लेकर कोई बंधनसीमा नहीं है । यह सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे, कच्चे सूत और सोने या चाँदी जैसी महँगी वस्तुओं की हो सकती है । प्रायः राखी बहनों द्वारा भाइयों को बाँधा जाता है मगर गुरूओं, ब्राह्मणों और परिवार में छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित संबंधियों जैसे पुत्री द्वारा पिता को भी बाँधी जाती है । स्कूली बालिकाओं द्वारा कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्‍ति को भी भी राखी बाँधी जाती है । कुछ बहनें सैनिकों को भी राखी भेजती हैं । पर्यावरण असंतुलन के कारण वृक्षों की महत्ता लोग अब समझने लगे हैं । अतः वृक्षों को भी राखी बाँधने की परंपरा का श्रीगणेश हुआ है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भगवा रंग की राखी परस्पर भाईचारा एवं समरसता कायम करने हेतु पुरूष सदस्यों द्वारा पारस्परिक रूप से बाँधने का रिवाज है रक्षासूत्र बाँधते समय सभी आचार्य एक श्लोक का उच्चारण करते हैं जिसमें रक्षाबंधन का संबंध राजा बलि से होना प्रचलित है । यह श्लोक रक्षाबंधन का अभीष्ट मंत्र है । श्लोक का भावार्थ यह है कि जिस रक्षासूत्र से महान शक्‍तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बाँधा गया था उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बाँध रहा हूँ जिससे तुम्हारी रक्षा होगी।

तैयारी :
प्रातःकाल स्नानादि से निवृत होकर लड़कियाँ एवं महिलाएँ पूजा की थाल में राखी, रोली, हल्दी, चावल, दीपक, मिठाई आदि से सजाती हैं । लड़के एवं पुरूष तैयार होकर टीका लगवाने के लिए उपयुक्‍त स्थान पर बैठ जाते हैं । अभीष्ट देवता की पूजा के उपरांत रोली या हल्दी से भाई का टीका करके चावल को टीके पर लगाया जाता है और सिर पर छिड़क दिया जाता है । तदुपरान्त आरती उतारी जाती है । बहनों द्वारा दाहिनी कलाई पर राखी बाँधने के बाद मिठाई से मुँह मीठा किया जाता है । इसके बाद भाइयों द्वारा सामर्थ्यानुसार उपहार एवं पैसे बहनों को दी जाती है । इस दिन दोपहर का भोजन महत्वपूर्ण होता है और अनुष्ठान पूर्ण होने तक व्रत रखने की भी परंपरा है । आचार्यों एवं पुरोहितों द्वारा यजमानों के घर जाकर राखी बाँधा जाता है और इसके फलस्वरूप धन, वस्त्र और भोजन आदि उन्हें मिलता है । देखा जाय तो यह पर्व भारतीय समाज में व्यापकता एवं गहराई से समाया है । रक्षाबंधन का सामाजिक महत्व होने के साथ-साथ इसका संबंध धर्म, पुराण, इतिहास, साहित्य और फिल्मों से भी है ।

सामाजिक संदर्भ :
बहनों द्वारा भाइयों के दायीं हाथ पर राखी बाँधकर उसे मस्तक पर तिलक करने तथा उसकी दीर्घायु होने की कामना किया जाता है । भाइयों द्वारा बहनों की रक्षा का वचन दिया जाता है । वास्तव में भाई-बहन के प्यार को राखी के रंगबिरंगे धागे और मजबूती प्रदान करते हैं । भाई-बहन एक दूसरे को मिठाई खिलाते हैं और सुख-दुख में साथ रहने का भरोसा दिलाते हैं । रक्षाबंधन एक ऐसा पर्व है जो भाई-बहन के पवित्र रिश्ते को पूरा आदर और सम्मान देता है । सगे भाई-बहनों के अलावे अनेक भावनात्मक रिश्ते भी इस पर्व से जुड़े हैं जो जाति धर्म और देश की सीमाओं से भी परे होते हैं । भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ-साथ कुछ प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं राज्यपालों के निवास पर भी रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है जहाँ छोटे बच्चे उन्हें राखी बाँधते है । स्नेह और आत्मीयता के बंधन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने के कारण केवल बहन भाई को ही नहीं अन्य संबंधों में भी रक्षा अर्थात राखी बांधने का प्रचलन है । गुरू द्वारा शिष्य को या शिष्य द्वारा गुरू को रक्षासूत्र बाँधने के संदर्भ यह कि भारत में प्राचीन काल में जब शिष्य अपनी शिक्षा पूरी करने के उपरांत गुरूकुल से विदा लेता था तो वह आचार्य का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उसे रक्षासूत्र बाँधता था जबकि आचार्य अपने विद्यार्थी को इस कामना के साथ रक्षासूत्र बाँधता था कि उसने जो ज्ञान प्राप्त किया है वह अपने भावी जीवन में उसका समुचित ढंग से प्रयोग करे ताकि वह अपने ज्ञान के साथ-साथ आचार्य के गरिमा की रक्षा करने में भी सफल हो । आज भी किसी धार्मिक विधि-विधान से पूर्व पुरोहित को, जिससे एक दूसरे के सम्मान की रक्षा हो सके । सामाजिक और पारिवारिक एकसूत्रता का सांस्कृतिक माध्यम रहा है यह रक्षाबंधन पर्व ।
रक्षाबंधन के बहाने रिश्तों का नवीनीकरण या रिनुअल होने के साथ सगे ही नहीं दूरदराज के भाइयों एवं बहनों का मेल मिलाप संभव हो पाता है । दो परिवारों के साथ-साथ दो कुलों का जुड़ाव भी इस माध्यम से संभव हो पाता है । समाज के विभिन्‍न वर्गों के बीच की एकसूत्रता के रुप में इस पर्व का उपयोग किया जाता है । टूटी कड़ी को धागों की डोर से कसकर फिर से पल्लवित-पुष्पित किया जाता है । रक्षाबंधन के बहाने कुछ विशेष पकवान यथा घेवर, शकरपारे, नमकपारे और घुघनी/छोले हलवा, खीर आदि का रसास्वादन कर लेते हैं । अब तो अधिकांश कवियों एवं लेखकों ने रक्षाबंधन की महत्ता को अपने सृजन का विषय बना लिया है । 1987 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जनजागृति के उद्देश्य से इस पर्व को माध्यम बनाया गया था । रविन्द्रनाथ ठाकुर ने बंग-भंग आंदोलन काल में रक्षाबंधन त्यौहार को बंगाल निवासियों को पारस्परिक एकता एवं भाईचारे का प्रतीक के रूप में राजनीतिक उपयोग प्रारंभ किया । 1905 में उनकी प्रसिद्ध कविता मातृभूमि वंदना में उन्होंने जो लिखा था उसका हिन्दी अनुवाद यह है कि “हे प्रभु मेरे बंगदेश की धरती, नदियाँ, वायु, फूल, सब पावन हों । हे प्रभु मेरे बंगदेश के हर भाई प्रत्येक बहन के उर, अंतःस्थल, अविछन्‍न, अविभक्‍त एक हों । ”

धार्मिक संदर्भ :
रक्षाबंधन को उत्तरांचल का श्रावणी कहते हैं । इस दिन यजुर्वेदी द्विजों का उपकर्म होता है तथा उत्सर्जन, स्नान विधि, ऋषि-तर्पणादि करके नया यज्ञोपवीत धारण करते हैं । यह ब्राह्मणों का सर्वोपरि त्यौहार माना जाता है । ब्राह्मण अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते हैं । विख्यात अमरनाथ यात्रा गुरूपूर्णिमा से प्रारंभ होकर रक्षाबंधन के दिन संपूर्ण होती है । प्रचलित कहावत है कि इसी दिन हिमानी शिवलिंग इसी दिन पूर्ण आकार ग्रहण करता है व इस उपलक्ष्य में अमरनाथ गुफा में प्रत्येक वर्ष मेला भी लगता है । महाराष्ट्र राज्य में यह त्यौहार नारियल पूर्णिमा या श्रावणी के नाम से मशहूर है । इस दिन लोग समुद्रतट या नदी के किनारे अपने जनेऊ बदलते हैं और समुद्र या नदी की पूजा, अराधना करते हैं । इस मौके पर समुद्र के स्वामी वरूण देवता को प्रसन्‍न करने के लिए नारियल चढ़ाने की परंपरा के कारण रक्षाबंधन के दिन मुंबई के समुद्र तट नारियलों से भर जाते हैं । राजस्थान में रामराखी और चूड़ाराखी अथवा लूंबा बांधने का प्रचलन है । रामराखी सामान्य राखी से अलग होता है जिसमें लाल डोरे पर एक पीले छीटों वाला फुदना लगा होता है, जिसे केवल भगवान को ही बाँधा जाता है । चूड़ा राखी भाभियों की चूड़ियों की शोभा बढ़ाती है । जोधपुर में राखी के दिन केवल राखी ही नहीं बाँधी जाती है, बल्कि दोपहर में पद्मसर और मिनकानाडी पर गोबर, मिट्टी और भस्मी से स्नाकर शरीर को शुद्ध किया जाता है । इसके बाद धर्म तथा वेदों के प्रवचनकर्त्ता अंरूधती, गणपति, दुर्गा, गोमिला तथा सप्तर्षियों के दर्भ के पूजास्थल बनाकर मंत्रोच्चारण के साथ पूजा की जाती है एवं उनका तर्पण कर पितृऋण चुकाया जाता है । धार्मिक अनुष्ठान करने के बाद घर आकर हवन किया जाता है तथा वहीं रेशमी डोरे से राखी बनाकर कच्चे दूध से अभिमंत्रित करने के उपरान्त भोजन किया जाता है ।
तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और उड़ीसा के दक्षिण भारतीय ब्राह्मण इस पर्व को अवनि अक्‍तिम कहते हैं । यज्ञोपवीतधारी ब्राह्मण इस दिन नदी या समुद्र तट पर स्नादि के बाद ऋषियों का तर्पण कर नया यशोपवीत धारण किया जाता है । विगत वर्षों के पुराने पापों को पुराने यज्ञोपवीत की तरह त्याग देने और स्वच्छ नया यज्ञोपवीत की तरह नए जीवन की शुरूआत करने की प्रतिज्ञा ली जाती है । इस दिन यजुर्वेदीय ब्राह्मण 6 मास के लिए वेद अध्ययन प्रारंभ करते हैं । इस पर्व का एक नाम उपक्रमण भी है जिसका अर्थ है- नई शुरूआत । व्रत में हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया) से श्रावणी पूर्णिमा तक सभी मंदिरों तथा घरों में ठाकुर झूले में विराजमान होते हैं और रक्षाबंधन वाले दिन झूलन दर्शन समाप्त होते हैं ।

पौराणिक संदर्भ :
राखी का त्यौहार कब शुरू हुआ यह कोई नहीं जानता । लेकिन भविष्य पुराण में वर्णन है कि देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तब दानव हावी होते नजर आने लगे । भगवान इन्द्र घबरा कर वृहस्पति के पास गये । वहां बैठी इंद्र की पत्‍नी इंद्राणी सब सुन रही थी । उन्होंने रेशम का धागा मंत्रों की शक्‍ति से पवित्र करके अपने पति के हाथ पर बांध दिया । वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था । लोगों का विश्‍वास है कि इंद्र इस लड़ाई में इसी धागे की मंत्र शक्‍ति से विजयी हुए थे । उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन यह धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है । यह धागा धन, शक्‍ति, हर्ष और विजय देने में पूरी तरह समर्थ माना जाता है ।
स्कन्द पुराण, पद्मपुराण और श्रीमद्धागवत में वामनावतार नामक कथा में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है । कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्‍न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की । तब भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे । गुरू के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी । भगवान ने तीन पग में सारा आकाश पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया । इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकानाचूर कर देने के कारण यह त्यौहार ‘बलेव’ नाम से भी प्रसिद्ध है । कहते हैं कि जब बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्‍ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया । भगवान के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय बताया । उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और अपने सामने रहने का वचन ले लिया और अपने पति भगवान बलि को अपने साथ ले आयी । उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी । विष्णु पुराण के एक प्रसंग मे कहा है कि श्रावण के दिन भगवान विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था । हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है ।

ऐतिहासिक संदर्भ :
राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएं उनको माथे पर कुमकुम तिलक लगाने के साथ साथ हाथ में रेशमी धागा भी बांधती थीं । इस विश्‍वास के साथ यह धागा उन्हें विजयश्री के साथ वापस ले आएगा । राखी के साथ एक और प्रसिद्ध कहानी जुड़ी हुयी है । कहते हैं, मेवाड़ की महारानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की पूर्वसूचना मिली । रानी लड़ने में असमर्थ थी । उसने मुगल राजा हुमायूं को राखी भेजकर रक्षा की याचना की । हुमायूँ ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुँच कर बहादुरशाह के विरूद्ध मेवाड़ की ओर से लड़ते हुए कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की । कहते हैं सिकंदर की पत्‍नी ने अपने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास को राखी बांधकर अपना मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिंकदर को न मारने का वचन लिया । पुरूवास ने युद्ध क दौरान हाथ में बंधी राखी का और अपनी बहन को दिये हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवनदान दिया ।
महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब ज्येष्ठ पाण्डव, युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को पार कैसे कर सकता हूँ तब भगवान कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्यौहार मनाने की सलाह दी थी । उनका कहना था कि राखी के इस रेशमी धागे में वह शक्‍ति है जिससे आप हर आपत्ति से बहार आ सकते हैं । इस समय द्रौपदी द्वारा कृष्ण को तथा कुन्ती द्वारा अभिमन्यु को राखी बांधने के उल्लेख मिलते हैं । महाभारत में ही रक्षाबंधन से संबंधित कृष्ण और द्रोपदी का एक और वृत्तांत मिलता है । जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई । द्रोपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बाँध दी । यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था । कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया । कहते हैं परस्पर एक दूसरे की रक्षा और सहयोग की भावना रक्षाबंधन के पर्व में यहीं से आन मिली ।

साहित्यिक संदर्भ
अनेक साहित्यिक ग्रंथ ऐसे हैं जिनमें रक्षाबंधन के पर्व का विस्तृत वर्णन मिलता है । इनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण है हरिकृष्ण प्रेमी का ऐतिहासिक नाटक रक्षाबंधन जिसका 1991 में 98वाँ संस्करण प्रकाशित हो चुका है । मराठी में शिंदे साम्राज्य के विषय में लिखते हुए रामराव सुभानराव बर्गे ने भी एक नाटक लिखा है जिसका शीर्षक है राखी उर्फ रक्षाबंधन । पचास और साठ के दशक में रक्षाबंधन हिंदी फिल्मों का लोकप्रिय विषय बना रहा । ना सिर्फ ‘राखी’ नाम से बल्कि ‘रक्षाबंधन’ नाम से भी फिल्म बनाई गई । ‘राखी’ नाम से दो बार फिल्म बनी, एक बार सन 1949 में, दूसरी बार 1962 में, सन 62 में आई फिल्म को ए. भीमसिंह ने बनाया था, कलाकार थे अशोक कुमार, वहीदा रहमान, प्रदीप कुमार और अमिता । इस फिल्म में राजेंद्र कृष्ण ने शीर्षक गीत लिखा था - ‘राखी धागों का त्यौहार’ । सन 1972 में एस. एम. सागर ने फिल्म बनाई थी ‘राखी’ और ‘हथकड़ी’ इसमें आर. डी. बर्मन का संगीत था । सन 1972 में राधाकांत शर्मा ने फिल्म बनाई ‘राखी और राइफल’ । दारा सिंह के अभिनय वाली यह एक मसाला फिल्म थी । इसी तरह सन 1976 में ही शांतिलाल सोनी ने सचिन और सारिका को लेकर फिल्म ‘रक्षाबंधन’ नाम की बनाई ।

डाक विभाग की तैयारी :
भारत सरकार के डाक-तार विभाग द्वारा इस अवसर पर दस रूपए वाले आकर्षण लिफाफों की बिक्री की जाती हैं । लिफाफे की कीमत 5 रूपए और 5 रूपए डाक का शुल्क । इसमें राखी पर बहनें, भाई को मात्र पांच रूपए में एक साथ तीन-चार राखियाँ भेज सकती हैं । डाक विभाग की ओर से बहनों को दिए इस तोहफे के तहत 50 ग्राम वजन तक राखी का लिफाफा पांच रूपए में भेजा जा सकता है जबकि सामान्य 20 ग्राम के लिफाफे में एक राखी ही भेजी जा सकती है । यह सुविधा रक्षाबंधन तक ही उपलब्ध रहती हैं । रक्षाबंधन के अवसर पर बरसात के मौसम का ध्यान रखते हुए डाक-तार विभाग ने बारिश से खराब न होने वाले वाटरप्रूफ लिफाफे उपलब्ध कराए हैं । ये लिफाफे अन्य लिफाफों से भिन्‍न हैं । इसका आकार और डिजाइन भी अलग है और इसके अलग डिजाइन के कारण राखी इसमें ज्यादा सुरक्षित रहती है । डाक-तार विभाग पर रक्षाबंधन के अवसर पर 20 प्रतिशत अधिक काम का बोझ पड़ता है । अतः राखी को सुरक्षित और तेजी से पहुँचाने के लिए विशेष उपाय किए जाते हैं और काम के हिसाब से इसमें सेवानिवृत डाककर्मियों की भी सेवा ली जाती है । कुछ बड़े शहरों के बड़े डाकघरों में राखी के लिए अलग से बॉक्स भी लगाए जाते हैं । इसके साथ ही चुनिन्दा डाकघरों में सम्पर्क करने वाले लोगों को राखी बेचने की भी इजाजत दी जाती है, ताकि लोग वहीं से राखी खरीद कर निर्धारित स्थान को भेज सकें ।

हाईटेक तकनीक और राखी :
आज के आधुनिक तकनीकी युग एवं सूचना संप्रेषण युग का प्रभाव राखी जैसे त्यौहार पर भी पड़ा है । कई सारे भारतीय आजकल विदेश में रहते हैं एव उनके परिवार वाले (भाई एवं बहन) अभी भी भारत या अन्य देशों में हैं । इंटरनेट के आने के बाद कई सारी ई-कॉमर्स साइट खुल गई हैं जो ऑनलाइन आर्डर मंजूर करती हैं एवं राखी दिये गये पते पर पहुँचा दी जाती है । इसके अतिरिक्‍त भारत में राखी के अवसर पर इस पर्व से संबंधित एनीमेटेड सीडी भी आई है, जिसमें एक बहन द्वारा भाई को टीका करने व राखी बाँधने का चलचित्र है । यह सीडी राखी के अवसर पर अनेक बहनों ने दूर रहने वाले अपने भाइयों को भेजी ।

उपसंहार :
“कुल मिलाकर देखा जाय तो रक्षाबंधन के माध्यम से न केवल भाई-बहन बल्कि संपूर्ण राष्ट्र व विश्‍व में भाईचारे व प्रेम का मजबूत बंधन कायम किया जा सकता है । वह दिन दूर नहीं जब भारतीय संस्कृति की इस प्रमुख परंपराको विदेशी भी अपनाऐंगे । रक्षाबंधन के मौके पर फिलहाल हम सभी बहनों को यह संदेश देना चाहेंगे कि अपने भाइयों से वे न केवल अपनी सुरक्षा की चाहत रखें बल्कि संपूर्ण देश की सुरक्षा का महत्वपूर्ण वचन देने एवं उस पर अमल करने की माँग शगुन के तौर पर अवश्य माँगें । ”


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