ना ! यूँ घर-घर में नहीं जन्मेंगे कृष्ण और राम
- पं. शक्ति मोहन श्रीमाली
डॉक्टर साहब मेरी पत्नी गर्भवती है पांच दिन बाद जन्माष्टमी है, आप बस जमाष्टमी के दिन ही ऑपरेशन से डिलेवरी करवा दीजिये ! हमें कान्हा मिल जायेंगे । शुभ मुहूर्त में सर्जरी से प्रसव यह एक नवीन विचारधारा है जो इन दिनों बहुत तेजी से समाज में अपने पाँव पसार रही है । श्रेष्ठ भाग्यवान संतान प्राप्ति की अभिलाषा इस अवधारणा के फूलने-फलने का मूल कारण है । कोई भी व्रत-पर्व या शुभ दिन का अवसर हो आजकल अस्पतालों में ऑपरेशन से डिलेवरी करवाने वालों का ताँता लगा रहता है । भीड़-भाड़ के झमेले से बचने के लिये बहुत पहले से ही हॉस्पिटल, बैड आदि बुक हो जाते हैं । डॉक्टरों को भी फुर्सत नहीं मिलती । क्या डॉक्टर और क्या गर्भवती महिला के परिजन दोनों ही अपना-अपना मतलब साधने में लगे हुए हैं । ज्योतिषी भी इस दौड़ में अपनी रोटियां सेंकने में पीछे नहीं हैं । जब कोई डिलेवरी का मुर्हूत पूछने आता है तो पंडित महाशय पंचांग के पन्ने पटलता है कागज में कुछ गणित करता है और शिशु के जन्म लेने से पहले ही उसकी कुण्डली यजमान के हाथ में थमा देता है । विज्ञान ने सर्जरी की तकनीक क्या ईजाद की गोया इंसान के खुराफॉती दिमाक ने भाग्य निर्माता विधाता को ही चुनौती देने का रास्ता खोज निकाला । उसने सोचा जिस कुण्डली को देखकर ज्योतिषी भविष्य बताता है आखिर उसके निर्माण का आधार जन्म ही तो है तो क्यों न जन्म समय को ही बदल दिया जाय । भाग्यशाली संतान प्राप्ति का यह फार्मूला नितान्त, निर्मल और भ्रामक धारणा है । सर्व साधारण को यह समझ लेना चाहिये की समय से पूर्व अप्राकृतिक प्रसव से श्रेष्ठ कुण्डली की रचना तो अवश्य की जा सकती है किन्तु ईश्वरीय सत्ता में इस प्रकार के हस्तक्षेप से जन्म लेने वाले शिशु के भाग्य को नहीं बदला जा सकता क्योंकि जन्म कुण्डली कोई चमत्कार नहीं है और न ही ये मनुष्य के भाग्य का निर्माण करती है । जन्म कुण्डली वस्तुतः मनुष्य के पूर्वजन्मार्जित भाग्य को बताने की एक विधा मात्र है । दूसरे शब्दों में इसे एक सूचना शास्त्र कह सकते हैं । तपोनिष्ट, विद्वद् ऋषि-मुनियों द्वारा रचित ज्योतिषशास्त्र ग्रहों के आधार पर एक विश्लेषणात्मक संकेत करता है कि जातक का अमुक पक्ष, अमुक काल कष्टप्रद या सुखप्रद बना रहेगा । वास्तव में प्रत्येक जन्मे-अजन्में प्राणी का प्रारम्भ उसके पूर्व जन्मों के संचित शुभाशुभ कर्मानुसार पहले से ही निर्धारित होता है ।
पूर्वजन्म व पुनर्जन्म की अवधारणा को संसार के प्रायः अधिकांश धर्म मान्यता देते हैं । गीता में श्री कृष्ण कहते हैं- जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के उपरान्त उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है । आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया भौतिक शरीर धारण करती है । अर्थात किसी अदृश्य शक्ति द्वारा संचालित आत्मा अपने पिछले अच्छे-बुरे कर्म समुदायों को भोगने के लिये माता के गर्भ में विकसित हो रहे पिण्ड में प्रवेश करता है और समय पाकर जीवात्मा के रूप में पुनः पृथ्वी पर अवतरित होता है । कर्म भोगों को भोगने का यह सिलसिला जन्मजन्मान्तरों तक चलता ही रहता है । मनुष्य अपने पूर्व जन्मों के संचित शुभ-अशुभ कर्मों के फल इस जन्म में भोगता है इसके अतिरिक्त उसे शरीर के साथ पिछली पीढ़ियों के (अनुवांशिक) कर्म फल भी प्रारब्ध के रूप में प्राप्त होते हैं । वर्तमान जन्म के कर्म भावी भविष्य का निर्माण करते हैं । सैद्धान्तिक दृष्टि से देश, काल, पारिवारिक, सामाजिक संस्कार भी भाग्य निर्माण में सहायक होते हैं । सारांशतः मनुष्य इस जन्म में पूर्व जन्मार्जित, आनुवांशिक व वर्तमान क्रियमान कर्मों के फलों को सम्मलित रूप से भोगता है ।
पुराणों, संहिता व स्मृति ग्रंथों में सोलह संस्कारों का वर्णन मिलता है इसमें गर्भाधान संस्कार प्रथम संस्कार है । इन ग्रंथों में सन्तति निमित्त अनेक मर्यादाओं, मुहूर्तों एवं धार्मिक विधि विधानों का उल्लेख है किन्तु आधुनिक युग में मानव जीवन का यह महत्वपूर्ण संस्कार लुप्त प्रायः हो गया है । वास्तव में हम परिवार में जिस अनजान जीवात्मा के आगमन की प्रतीक्षा या इच्छा करते हैं उसका आवाहन् स्वस्थ मनोदशा, धार्मिक विधि विधान तथा शास्त्रोक्त मुर्हूताआदि निर्देशानुसार किया जाना चाहिये । जिस प्रकार ऋतुकाल में भूमि में रोपित वृक्ष के बीज का पनपना, फैलना तथा वृक्ष का आकार लेना बीजारोपण के अनुकूल-प्रतिकूल समय, जल, वायु एवं खाद पर निर्भर करता है उसी प्रकार स्त्री के गर्भ में मनुष्य के बीज का उत्तम- अनुत्तम निर्माण, विकास, भ्रूण में पुण्यात्मा-दुष्टात्मा का प्रवेश गर्भधारण के अनुकूल-प्रतिकूल समय, वातावरण एवं भोजनादि पर निर्भर करता है ।
वास्तव में भाग्यवान संतान प्राप्ति की मनोवृत्ति से असमय सर्जरी द्वारा प्रसव करवाना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान है क्योंकि इस प्रकार के जन्म समयानुसार निर्मित जन्म कुण्डली के आधार पर किया गया भविष्यकथन जीवन की वास्तविक शुभता-अशुभता को उजागर नहीं का कर सकता है और प्रतिकूल समय आने पर बाधक ग्रहों की समुचित जानकारी भी प्राप्त नहीं की जा सकती है । इसके अतिरिक्त चिकित्सा शास्त्र के अनुसार भी समय से पूर्व अप्राकृतिक प्रसव करवाने से माता, शिशु अथवा दोनों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड सकता है ।
संतान प्राप्ति की अभिलाषा रखने वाले दम्पतियों को स्वस्थ, बुद्धिमान, योग्य, निरोग, दीर्घजीवी एवं भाग्यशाली संतान की प्राप्ति हेतु गर्भाधान संस्कार की महत्ता को समझना व स्वीकार करना चाहिये । इस प्रकार न केवल भाग्यहीन, क्षीण व जन्मजात विकृत संततियों को रोका जा सकता है अपितु एक समग्र, सुसंस्कृत एवं प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण का सपना साकार हो सकता है ।
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