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Today : 07-02-2012 
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जीवन में सत्सङ्ग तथा स्वाध्याय का महत्व


एक कथन है- “संसारदीर्घंरोगस्य सुविचारोमहौषधम्‌ ।” अर्थात्‌ ‘यह संसार एक लम्बा रोग है और अच्छे विचार, कल्याणकारी विचार इस रोग की महौषध हैं ।

‘यमराज’ ने भी नाचिकेता से यही कहा था-

“श्रेयश्‍च प्रेयश्‍च मनुष्यमेतस्तौ, संपरीत्य विविनक्‍ति धीर ः ।

श्रेयो हि धीरो अभिप्रेयसो वृणीते, प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्‌ वृणन्ते ॥’



अर्थात्‌- ‘सुनो नाचिकेता, दो रास्ते हैं, श्रेय और प्रेय । एक वह जो कल्याण करने वाला है, दूसरा वह जो अच्छा लगने वाला है । दोनों मनुष्य के सामने आते हैं । जो बुद्धिमान हैं, जिनके पास सूझ-बूझ है, समझ है वे श्रेय मार्ग को, कल्याण करने वाले रास्ते को अपनाकर उस पर चलना आरम्भ कर देते हैं ।’

भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने भी कहा है-

“दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।

अज्ञान चाभिजातस्य पार्थं सम्पदामासुरीम ॥



अर्थात- ‘हे पार्थ, जो लोग पाखण्ड, घमण्ड, अभिमान, क्रोध और कठोरवाणी व अज्ञान के रास्ते को अपनाते हैं, वे आसुरी सम्पदावाले अर्थात्‌ राक्षस हैं ।’ आज संसार में जितना भी अनाचार, दुराचार, भ्रष्टाचार, आतंकवाद आदि देखा जा रहा है और भोगा जा रहा है, उसका एकमात्र कारण है कि मानव-जीवन से सत्सङ्ग तथा स्वाध्याय एवं अध्ययन की परिपाटी ही समाप्त कर दी गई है । सारी दुनिया भौतिकता एवं स्वार्थपरता की चकाचौंध में दिग्भ्रमित होकर विनाशकारी प्रेयमार्ग पर दौड़ी चली जा रही है । घर-घर से एक ही आवाज आती है- खाओ, पीओ, भोगो, लूटो, गाओ, नाचो और मौज करो । युद्ध करो हिंसा को करो और तबाही फैलाओ । कल्याणकारी वैचारिक क्रांति की इस समय अतीव आवश्यकता है तथा मानवता की सुरक्षा एवं सुरक्षा के लिए सत्सङ्ग तथा स्वाध्याय की परिपाटी को पुनः जीवित करके ही संसार में सुख-शांति और समझदारी का वातावरण बनाया जा सकता है ।

सत्सङ्ग का महत्व

महाभारत में कथन है-

‘वस्त्राण्यपस्तिलान्‌ भूमिंगन्धोवासयते यथा,

पुष्पाणामधिवासेन तथा संसर्गजा गुणाः ।

तस्मात्‌ प्राज्ञैश्च वृद्धैश्च सुस्वभावैस्तपस्विमिः,

सद्‌भिश्च सह संसर्गः कार्यः शमपरायणैः ॥”



अर्थात्‌ जिस प्रकार फूलों के संसर्ग से उनकी गन्ध वस्त्र, जल, तिल और भूमि को सुवासित कर देती है, वैसे ही सत्सङ्ग से होने वाले गुण भी अपना असर करते हैं । अतएव ज्ञानी महात्माओं, अनुभवी वृद्धों, उत्तम स्वभाव वाले तपस्वियों और परम शान्ति, देने वाले सत्पुरूषों का ही संसर्ग रखना चाहिए ।’

सत्सङ्ग से बुद्धि प्रखर हो जाती है और मनुष्य के अन्दर सुविचार पैदा होने लगते हैं । भगवान्‌ श्री कृष्ण का भी उपदेश है-

‘प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।

बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥”

अर्थात्‌- “पार्थ, प्रवृत्ति और निवृत्ति, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय और अभय तथा बन्धन और मोक्ष को जो बुद्धि यथार्थ रूप से जानती है, वही सात्त्विकी है ।”

स्पष्ट है कि ऐसी सात्त्विकी बुद्धि केवल सत्सङ्ग से ही प्राप्त हो सकती है । जार्ज वाशिंगटन ने अपने देशवासियों को सत्सङ्ग के महत्व को बताते हुए कहा था-


``Associate yourself with men of good quality if you esteem your own reputation, for it is better to be alone than to be in bad company.''


स्वाध्याय एवं अध्ययन का महत्त्व


यदि सत्सड्ग करने योग्य मनीषी, विद्वान्‌ तत्वदर्शी उपलब्ध न हों तो क्या करें? इसका समाधान है- स्वाध्याय एवं अध्ययन । हमारे धर्मशास्त्रों में तथा ग्रन्थों में वह ज्ञान भरा पड़ा है जिसके अनुसार जीवनचर्या अपनाकर कोई भी व्यक्‍ति अपने जीवन को सार्थक एवं पुण्यवान बना सकता है । ‘भविष्यपुराण’ में कथन है- “पुस्तकं धर्मशास्त्रस्य धर्माधिष्ठानशाश्‍वतम्‌” - अर्थात्‌ ‘हमारी पुस्तकें शाश्‍वत धर्म का अधिष्ठान हैं ’। इन धर्मशास्त्रों के अध्ययन में हमें शाश्‍वत ज्ञान प्राप्त होता है । ‘मनुस्मृति’ में कहा गया है-


“अद्भिर्गात्राणि शुद्धयन्ति, मनः सत्येन शुद्धयति ।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा, बुद्धिर्ज्ञानेने शुद्धयति ॥’


अर्थात्‌- ‘जल से शरीर, सत्य से मन, विद्या और तप से अन्तःकरण तथा ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है ।’ स्वाध्याय में हम स्वयं ही पुस्तकों के माध्यम से संत पुरूषों तथा विद्वानों एवं मनीषियों के विचारों से साक्षात्कार करने में सफल होते हैं । जहाँ सत्सड्ग के लिए हमें दूसरों पर, निर्भर रहना होता है और उनके अनुसार अपने कार्यकलापों में से समय भी निकालना होता है, स्वाध्याय में पूर्ण स्वतंत्रता रहती है । जब भी समय मिले हम सत्साहित्य का स्वाध्याय कर सकते हैं और उनके विचारों पर चिंतन मनन भी । यही हमें दुष्कर्मों से बचाकर सत्कर्मों की ओर प्रेरित करते हैं । पुस्तकों के महत्व के ऊपर में स्वरचित तीन मुक्‍तकों को प्रस्तुत करता हूँ-


जीवन में सत्सड्ग तथा स्वाध्याय का महत्व
किताबें ही शैतान को इंसान बनातीं,
किताबें ही जिन्दगी का सम्मान सिखातीं;
कुछ ऐसा इन्किलाब लाती हैं किताबें;
जीने के तरीक़े का हमें ज्ञान सिखाती ॥१॥
किताबें ही बताती हैं, जीवन की हक़ीक़त;
किताबें ही बढ़ाती हैं, इन्सान की इज्जत;
ग्रम हो कि ख़ुशी हो, सदा साथ निभातीं;
किताबें ही बचाती हैं; इंसान की अस्मत ॥२॥
किताबें तो दिया करती हैं, हर बार शहादत;
रखती हैं अपने अन्दर, तहजी़ब सलामत;
इन्सान की गरिमा को बढ़ाती हैं किताबें;
आतंक औ’ फसाद की देती न इजाज़त ॥३॥


सत्सड्ग और स्वाध्याय एवं अध्ययन की आदत जीवन में आध्यात्मिकता की सुखद अनुभूति पैदा करने लगेगी; विचार सात्विकी एवं कल्याणकारी होने लगेंगे और तामसी तथा राजसी मनोवृत्ति से शनैः शनैः मुक्‍ति मिलने लगेगी और अन्दर से आवाज़ उठने लगेगी कि-


‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामयाः ।
सर्वेभद्राणि पश्यन्तु, मा कश्‍चिददुःख्भाग्भवेत ॥”


अर्थात्‌- ‘सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सब कल्याण का साक्षात्कार करें । दुःख का अंश किसी को न प्राप्त हो ।” इस संसार की प्रत्येक वस्तु का सदुपयोग भी किया जा सकता है और दुरूपयोग भी । संसार की कोई भी वस्तु अपने आप में न अच्छी होती है, न बुरी । उसका अच्छा या बुरा होना उस वस्तु के उपयोग पर, उपभोग करने के उद्देश्य और ढंग पर तथा उसके परिणाम पर निर्भर होता है । ऐसा ही मामला हमारी इन्द्रियों का है । इन्द्रियों का सदुपयोग भी किया जा सकता है और दुरूपयोग भी । इन्द्रियों का सदुपयोग ही किया जाना चाहिए । लेकिन ज्यादातर इन्द्रियों का दुरूपयोग ही किया जाता है और मज़े की बात यह है कि उपयोग करने वाला कोई और है लेकिन इसके लिए दोषी हम इन्द्रियों को ही मानते हैं क्योंकि हम मानते हैं कि जो कुछ करती हैं इन्द्रियां ही करती है जबकि बात दर असल यह है कि इन्द्रियां ख़ुद कुछ नहीं करतीं बल्कि सिर्फ़ मन के आदेश का पालन करती है । सत्सड्ग और स्वाध्याय के द्वारा ही न केवल इन्द्रियाँ वश में रहेगी बल्कि उनका सदुपयोग भी किया जा सकेगा और इस प्रकार कल्याणकारी विचार मन में उमड़ने घुमड़ने लगेंगे तथा जीवन प्रेय मार्ग पर चलने लगेगा ।


- डॉ. रामसेवक शुक्ल
होम्योपैथ तथा मनोचिकित्सक




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