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Today : 25-05-2013 
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खुशी मनाने के नाम पर हत्याएं और हंगामा

- चांद खां रहमानी

दिवाली पर खबर पढ़ी कि हरियाणा के पलवल में पटाखे छोड़ने के मना करने पर कुछ युवकों ने एक आदमी की हत्या कर दी । हरियाणा के ही रानियां शहर में पटाखे छोड़ने को लेकर हुए विवाद में छह लोगों पर हमला कर दिया गया । मामला इतना बढ़ा कि कुछ लोग घायल हो गए और मामला थाने तक जा पहुंचा ।

इसी दिन यानी दिवाली की ही रात पटाखों से दिल्ली में 169 जगह आग लग गई । मेरठ के परीक्षागढ़ में एक झुलस गया । उप्र के ही खतौली, शामली, फुगाना, सहारानपुर और नानौता क्षेत्र में कई जगह आग लगी और एक व्यक्‍ति की मौत हो गई । खतौली में ही एक परिवार के छह लोग झुलस गए । इसके आलावा मेरठ के कई इलाकों में आग लगी । ऊपर जिन घटनाओं का जिक्र किया गया है वह उत्तर भारत के एक छोटे से क्षेत्र की घटना है, पूरे देश में कितनी जगह आग लगी होगी, कितने लोग मरे होंगे यह अखवार पढ़ने से पता लग सकता है । यह जरूर है कि यह सब घटनाएं त्यौहार और खुशी मनाने के नाम पर हुई हैं ।

त्यौहारों पर खुशी मनाना, श्रद्धा और आस्था का सार्वजनिक प्रदर्शन करना न तो अनैतिक है और न असंवैधानिक और न हम इसे समाज और मान्यताओं के खिलाफ मान सकते है । मगर ज त्यौहारों, विवाह शादियों पर खुशी मनाने या धर्म के नाम पर किये गए कार्यों से सार्वजनिक जीवन प्रभावित हो रहा हो, मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हो, पर्यावरण दूषित और असंतुलित हो रहा हो तब ऐसे खुशी मनाने पर चिंता होना लाजिमी है । ऐई खुशी के प्रदर्शन पर विचार करना जरूरी हो जाता है कि क्या ऐसी खुशी मनानी चाहिए या ऐसी खुशी मानने का समर्थन करना होना चाहिए ।

हमारा देश बहुधर्मी-बहु भाषी होने के कारण यहां सालभर त्योहार चलते रहते हैं । एक समुदाय का त्योहार जाता है तो दूसरे का आ जाता है । त्योहार मनाना अच्छी बात है । त्योहार से सामाजिक जीवन में उत्साह बढ़ता है । मनुष्य को ऊर्जा मिलती है उसे ताजगी का एहसास होता है । थके मांदे लोगों को खुशी मनाने का अवसर मिलता है । इनसे हमारी संस्कृति और परम्पराएं मजबूत होती हैं । नई पीढ़ी हमारी मान्यताओं से बावरता होती है । उन्हें बहुत कुछ समझने का मौका मिलता है । इसलिए त्योहारों से किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए और होती भी नहीं है ।

समस्या तब होती है जब त्योहार और खुशी मनाने के नाम पर भोंडा प्रदर्शन किया जाता है । उस भोंडे प्रदर्शन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाता है । इस दिवाली पर अरबों रुपए के पटाखे चलाए गए । सैकड़ों जगह आग लगी और करोड़ों की सम्पत्ति स्वाह हो गई । इसके अलावा कई जगह हत्याएं हुई । कई जगह लोग झुलसे तो कुछ के अंग भंग हुए । वायु प्रदूषण कितना हुआ यह बताने की जरूरत नहीं क्योंकि इस बार ध्वनि और वायु प्रदूषण ने सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दिए । ध्चनि प्रदूषण का यह हाल था कि घरों की स्लैप पर रखे बर्तन गिर गए रहे थे । छतों में लगे बल्ब के ढक्‍कन गिए गए । सोचिए, जब निर्जीव चीजों का यह हाल था तो प्राणियों का क्या हाल हुआ होगा । उसकी कितनी दुर्गति हुई होगी इसका अंदाजा लगाना कठिन नही है । सिर झन्‍ना गया, दर्द की कोई सीमा नहीं थी । लोग परेशान थे क्योंकि शोर जरूरत से ज्यादा था ।

समस्या तब और ज्यादा विकराल हो जाती है जब किसी व्यक्‍ति से ज्यादा शोर करने वाले पटाखे चलाने से मना किया जाय और वह मान जाने के बजाय आपको परेशान करने के लिए और ज्यादा जोरदार तरीके से चलाने लगे । बात बढ़ती है तो हत्या तक जा पहुंचती है । तब क्या खुशी या त्यओहार मनाने का मतलब हत्या करना, मारपीट करना, लोगों को परेशान करना या दुख पहुंचाना है ।

खुशी मनाने के लिए आसमानी पटाखे छोड़े जा सकते हैं, फुलझड़ी, अनार जैसे तमाम साधन हैं जिससे आप संतुष्ट हो सकते हैं । मान्यता है कि दिवाली दीयों और मिठाई पर्व है । लेकिन यह सब नेपथ्य में होता जा रहा है । ऐसा सिर्फ दिवाली पर ही नहीं अन्य त्योहारों पर भी होता है । कमोवेश हर तोहार को विकृत बना दिया गया है । होली-दीवाली जैसे सौम्य त्योहारों पर अब लोग खीजते हैं । होली को भी कम विद्रूप नहीं बना दिया गया है । परम्परा, मिथक, और इतिहास के होली के रंगों को बहुत ही खूबसूरती से वर्णन किया गया है ।

अगर उसी तरह की होली हो तो साल में तीन दफा भी मनाने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन उसे कदर खराब बना दिया गया है साल में एक बार मनाना भी मुसीबत हो जाता है । केमिकल युक्‍त रंग आंखों तक में चला जाता है । कीचड़ फेकी जाती है । राह चलते लोगों, लड़कियो पर गुब्बारे फेंक कर मारे जाते हैं । ऐसा लगता है मानों लोगों से दुश्मनी निकाली जा रही हो । शराब पीकर हंगामा करना, मारपीट और हत्या तक कर दी जाती है । अगर उन्हें कोई रोकता है तो झगड़ा होना तय है । ऐसे कृत्यों से त्योहारों की मान-मर्यादा घटती है ।

दुर्गा पूजा और गणेशोत्सव पर सैकड़ों कुंटल मिट्टी, केमिकल युक्‍त पदार्थ, लकड़ी, प्लास्टिक, रंग-नदियों और समुद्र में बहा दिया जाता है जिससे पर्यावरण दूषित होना लाजिमी है । कई बार तो मेटेरियल इतना जहरीला होता है कि जल जीव तक मर जाते हैं । पर्यावरण विशेषज्ञ और सरकार इन धर्मावलंबियों को समझाने में जुटी है कि वह इस तरह से त्योहार मनाएं जिससे उनकी भावनाएं भी संतुष्ट हो जाए और पर्यावर्ण पर भी प्रतिकूल असर न पड़े । इसी तरह मुसलमानों का भी एक तबका बारा बफात पर धूम धड़का करने में गुरेज नहीं करता जो कि गलत है ।

सवाल यह है कि क्या हम कानून के डर से ही मानेंगे? क्या हमारी कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है? क्या हर काम सरकार कराए । यह परम्परा और त्योहार के नाम पर हम बहुत कुछ सहन करते हैं और सरकार का मुंह देखते हैं कि गलत कामों को वह रोके । लेकिन हर काम सरकार नहीं करा सकती । इसलिए हमें अपनी जिम्मेदारी खुद निभानी होगी तभी हम कुछ सुधार है ।

इन्ट्रो:- [त्योहारों पर भोंडा प्रदर्शन] * ऐसा लगता है कि त्योहार के नाम पर लोग दुश्मनी निकाल रहे हैं * हत्या-मारपीट और लोगों को परेशान करना ही क्या खुशी है * ज्यादा शोर करना ही प्रतिष्ठा का प्रश्न मान लिया गया है । ]



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