जिन्दगी
- मनीषा मेहता
क्या है जिन्दगी कभी कोई समझा नहीं,
कितने रंग दिखाती है, किसी को नहीं पता ।
क्या-क्या करवाती है, किसी को नहीं पता,
क्या है जिन्दगी.........
यही जिन्दगी आसमान से जमीन पर लाती है,
रोतों को हंसना सिखाती है ।
राजा को रंक बनाती है,
फकीर को भी जीना सिखाती है ।
क्या है जिन्दगी..............
इस जिन्दगी के हजारों रंग है,
देखो तो यह एक सुन्दर सपना है ।
ना देखो तो एक काली रात,
और चाहो तो एक नयी सुबह है ।
क्या है जिन्दगी..................
जिन्दगी ही जीवन संवारती है,
जिन्दगी ही जिन्दगी को बिखेरती है ।
जिन्दगी एक नई उम्मीद है,
एक निराशा भी है, जो जीवन को,
रेत की तरह बिखेर देती है ।
क्या है जिन्दगी.........