एक सपनों के शहर की जुबानी
- कवी करन
रंग बिरंगी रोशनियों में चमकता था एक शहर
जाती धर्म की दीवारों को लांघता था एक शहर कई
ख्वाबो की मंजिले बनता था एक शहर
जवां उम्मीदों की राहो से जुड़ता था एक शहर
चमकते तारो से भरा तो तंग गलियों की गुजर बसर
आसमानी पट्टे से खुशियां बरसाता था एक शहर
सुख दुःख की
हर घड़ी में हाथ थामता एक शहर
मुश्किलों के भवसागर से पार लगाता एक शहर
तिनको के घरौंदों को भी बचाता एक शहर
तिनके के सहारे को किनारे पर लाता एक शहर
यकीं नहीं आता की रंग बदल सकता था यह शहर
चट्टान बन कर रक्षा करने
वाला भी सकता था सिहर
कौन सी हवाओं ने उगला यह जहर
जाने किस घड़ी में लगी इसे नजर
क्यों देने लगा यह चोट हर पहर
क्यों बाँट कर मिट्टी को मचाने लगा कहर
पुनर्निर्मित कर सकते टूटी हुई
दीवार पर कैसे भर पाओगे भेद
भाव की दरार
सुन सकता नहीं आज कोई इसकी कराह
देख ज्वलंत भविष्य रो रहा सिसक-सिसक कर
लालसा और भय के पर्दों ने बंद कर दिए कान
सुनता नहीं कहता क्या तुमसे यह शहर