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Today : 19-06-2013 
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दूर बैठ कर देखता गिरते पर्वतों से बहते उन लहरों को

- कवी करन
दूर बैठ कर देखता गिरते पर्वतों से बहते उन लहरों को
कही शायद मुझे न बहा जाये संग अपने
मैं बैठता दूर उनसे


और खो देता अवसर जीवन के उन पलो में बहने का
शायद ऐसे ही कभी मै ढूंढा करता था बहाने खुश रहने का
फिर एक दिन देखा तिनको से आशियाना बनाते परिंदों को
ना स्वार्थ ना पुण्य का प्रयोजन


पर निभाते थे रिश्तों को
पर आज भी दूर बैठ कर देखता हूँ गिरते पर्वतों से बहते उन लहरों को
खिलते कमल के संग नृत्य करते श्‍वेत परिंदों को
कैसे खो दू यह अवसर मै कुदरत के इन नागिनो का




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